छत्तीसगढ़ के बस्तर में आयोजित बस्तर पंडुम 2026 केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी परंपराओं, विरासत और विकास की नई पहचान बनकर उभरा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे संस्कृति का मंच बताते हुए कहा कि बस्तर अब भय नहीं, बल्कि विश्वास और विकास का प्रतीक बन चुका है।
बस्तर पंडुम: संस्कृति, परंपरा और पहचान का संगम
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बस्तर पंडुम आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और समृद्ध विरासत को समर्पित मंच है। यह आयोजन यह दर्शाता है कि बस्तर केवल जंगलों की धरती नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और परंपरागत ज्ञान का केंद्र है।
इस वर्ष बस्तर पंडुम में 12 विधाओं में कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें 54 हजार से अधिक लोगों ने पंजीयन कराया। पिछली बार जहां केवल 7 विधाएं थीं, वहीं इस बार इसका विस्तार और प्रभाव दोनों देखने को मिला।
नक्सल भय से विकास की ओर बस्तर
सीएम साय ने कहा कि कभी नक्सल हिंसा के लिए पहचाना जाने वाला बस्तर अब विकास के नए दौर में प्रवेश कर चुका है।
सरकार का लक्ष्य 31 मार्च 2026 तक पूरे बस्तर को नक्सल मुक्त बनाना है। कई गांवों में पहली बार तिरंगा फहराया गया, जो शांति और लोकतंत्र की जीत का प्रतीक है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बस्तर से भावनात्मक जुड़ाव
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि छत्तीसगढ़ आना उन्हें हमेशा घर जैसा महसूस कराता है। बस्तर पंडुम को लोग यहां उत्सव की तरह जीते हैं और इसकी संस्कृति देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करती है।
उन्होंने नक्सल हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले लोगों का स्वागत करते हुए स्पष्ट कहा कि हिंसा का रास्ता समाधान नहीं है।
ढोकरा शिल्प ने दिलाई बस्तर को वैश्विक पहचान
राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि ढोकरा शिल्प, पारंपरिक व्यंजन और लोक संस्कृति ने मिलकर बस्तर को विश्व पटल पर पहचान दिलाई है।उन्होंने कहा कि बस्तर की ढोकरा कला अब देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पसंद की जा रही है और यही इसकी सांस्कृतिक शक्ति है।
जनजातीय समाज और प्रकृति का गहरा रिश्ता
राज्यपाल ने कहा कि बस्तर के लोग जल, जंगल और जमीन के बीच संतुलन बनाकर जीवन जीते हैं। गांव-गांव से आए कलाकारों ने अपनी कला और संस्कृति के माध्यम से बस्तर की आत्मा को मंच पर जीवंत कर दिया।
बस्तर पंडुम 2026 ने यह साबित कर दिया कि बस्तर अब संघर्ष नहीं, बल्कि संस्कृति, शांति और विकास की नई कहानी लिख रहा है। आदिवासी समाज की कला, परंपरा और आत्मसम्मान आज देश के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।

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