धर्म

दर्शन दे निकसि अटा में ते : श्री पुरुषोत्तम जी के पद का भावार्थ, भक्ति रस और जीवन संदेश

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प्रस्तावना

भारतीय भक्ति परंपरा में कुछ पद ऐसे होते हैं जो केवल शब्द नहीं होते, बल्कि अनुभव बन जाते हैं।
श्री पुरुषोत्तम जी का यह पद “दरसन दे निकसि अटा में ते” भी ऐसा ही पद है।

यह पद भगवान के दर्शन की उस अनुभूति को व्यक्त करता है, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं होता। फिर भी भक्त अपने भावों को सरल शब्दों में हमारे सामने रख देता है, ताकि आम व्यक्ति भी उस आनंद को महसूस कर सके। सबसे पहले हम ब्रज के रसिक कवि श्री पुरूषोत्तम जी के इस पद को गाते हैं जिससे हमें उनका आशीर्वाद मिल सके फिर इस पद का भावार्थ समझने की कोशिश करेंगे।

श्री पुरुषोत्तम जी का मूल पद (शुद्ध हिंदी पाठ)

दरसन दे निकसि अटा में ते।
लट सरकाय दरस दे प्यारी,
निकस्यो चंद्र घटा में ते॥

कोटि रमा सावित्री भवानी,
निकसी चरन छटा में ते।
पुरुषोत्तम प्रभु यह रस चाख्यो,
माखन कढ़यो मठा में ते॥

श्री पुरुषोत्तम जी

पद का सरल भावार्थ

इस पद में भक्त यह कहता है कि प्रभु स्वयं भीतर से बाहर आकर दर्शन देते हैं।
यह कोई साधारण घटना नहीं है, बल्कि भक्त के लिए जीवन का सबसे सुंदर क्षण है।

जब प्रभु दर्शन देते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे घने बादलों के बीच से चाँद निकल आया हो।
अंधकार अपने आप दूर हो जाता है और मन प्रकाश से भर जाता है।

यह दर्शन अचानक होता है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत गहरा होता है।
भक्त के हृदय में शांति, आनंद और तृप्ति एक साथ उतर आती है।

“दरसन दे निकसि अटा में ते” का गूढ़ अर्थ

यह पंक्ति बताती है कि ईश्वर दूर नहीं हैं।
वे किसी ऊँचे सिंहासन पर बैठकर भक्त को अनदेखा नहीं करते।

जब भक्त का मन सच्चा होता है, तब प्रभु स्वयं आगे बढ़कर दर्शन देते हैं।
यह ईश्वर की करुणा और सुलभता का सबसे सुंदर चित्र है।

इस भाव से यह संदेश भी मिलता है कि भक्ति दिखावे से नहीं, सच्चे मन से होती है।

चंद्रमा और बादल का प्रतीकात्मक अर्थ

“निकस्यो चंद्र घटा में ते” केवल सौंदर्य वर्णन नहीं है।
यह मन की अवस्था को भी दर्शाता है।

जैसे बादल हटते ही चंद्रमा दिखाई देता है, वैसे ही जब मन के विकार हटते हैं, तब ईश्वर का अनुभव होता है।
अहंकार, क्रोध और मोह के बादल हटते ही भीतर प्रकाश प्रकट हो जाता है।

चरणों की महिमा का भाव

इस पद में कहा गया है कि प्रभु के चरणों में कोटि-कोटि लक्ष्मी, सावित्री और भवानी का वास है।
इसका अर्थ यह है कि संसार की सारी शक्तियाँ, वैभव और ज्ञान प्रभु के चरणों से ही उत्पन्न होते हैं।

भक्त यह स्वीकार करता है कि सांसारिक सफलता भी अंततः उसी स्रोत से आती है।

माखन और मठा का जीवन रूपक

पद की अंतिम पंक्ति जीवन का सबसे गहरा संदेश देती है।
जैसे दूध को मथने पर मक्खन निकलता है, वैसे ही जीवन को साधना और अनुभव से मथने पर भक्ति का रस निकलता है।

यह रस मिल जाने के बाद मन संसार के छोटे सुखों में नहीं उलझता।
भक्त के लिए वही सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाती है।

इस पद में श्रीजी के किस भाव का वर्णन है

इस पद में श्रीजी के माधुर्य और करुणा भाव का वर्णन किया गया है।
यहाँ भगवान शासक नहीं, बल्कि अपने भक्त के बेहद निकट खड़े प्रेममय स्वरूप में दिखाई देते हैं।

यह पद यह भी बताता है कि प्रभु डर से नहीं, प्रेम से पाए जाते हैं।

जीवन में इस पद का महत्व

यह पद केवल मंदिर या भजन तक सीमित नहीं है।
यह हमें रोज़मर्रा के जीवन में भी दिशा दिखाता है।

अगर इंसान धैर्य रखे, ईमानदारी से प्रयास करे और अहंकार को थोड़ा पीछे रख दे, तो जीवन अपने आप सही दिशा में आगे बढ़ने लगता है।

सफलता केवल धन या पद से नहीं आती।
असली सफलता तब मिलती है, जब मन शांत हो और उद्देश्य स्पष्ट हो।

जीवन में इस भाव को कैसे उतारें

जब इंसान अपने काम को पूरी निष्ठा से करता है, तो परिणाम अपने आप निकलता है।
जल्दबाज़ी और तुलना करने से केवल बेचैनी बढ़ती है।

इस पद से यह भी सीख मिलती है कि दिखावे की बजाय भीतर की सफाई ज़रूरी है।
मन जितना हल्का होगा, निर्णय उतने ही स्पष्ट होंगे।


निष्कर्ष

श्री पुरुषोत्तम जी का यह पद हमें यह सिखाता है कि जीवन की दौड़ में रुककर भीतर झांकना भी ज़रूरी है।
जब इंसान अपने जीवन को समझदारी, धैर्य और प्रेम से जीता है, तब सफलता केवल लक्ष्य नहीं रहती, बल्कि स्वाभाविक परिणाम बन जाती है। यही इस पद का सबसे बड़ा संदेश है।

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