माई री मैं तो लियो गोबिंदो मोल।
कोई कहै छाने, कोई कहै छुपके, लियोरी बजंता ढोल ॥ १ ॥
कोई कहै मुँहघो, कोई कहै सुहँघो, लियो री तराजू तोल ।
कोई कहै काळो, कोई कहै गोरो, लियो री अमोलक मोल ॥ २॥
कोई कहै घरमें, कोई कहै बनमें, राधाके संग किलोल ।
मीराके प्रभु गिरधर नागर, आवत प्रेमके मोल ॥ ३ ॥
Meera bai bhajan with lyrics in hindi
मीरा जी के इस पद में भक्ति और प्रेम का संदेश दिया गया है। पद में मीरा जी अपने प्रभु गोविंद (कृष्ण) के प्रति अपनी पूर्ण समर्पण भावना व्यक्त कर रही हैं। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
पंक्ति 1:
“माई री मैं तो लियो गोविंदो मोल।”
मीरा जी कहती हैं कि उन्होंने अपने जीवन को प्रभु गोविंद के चरणों में अर्पित कर दिया है। उनके लिए गोविंद ही सबसे मूल्यवान हैं।
पंक्ति 2:
“कोई कहे छाने, कोई कहे छुपके, लियो री बजंता ढोल।”
यहां मीरा कहती हैं कि कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने छिपकर गोविंद को अपनाया, तो कुछ कहते हैं कि उन्होंने खुलेआम (ढोल बजाकर) अपने प्रभु को अपनाया। मतलब यह है कि उन्होंने किसी भी स्थिति में प्रभु को अपनाने में संकोच नहीं किया।

पंक्ति 3:
“कोई कहे मुँहचो, कोई कहे सुहैंचो, लियो री तराजू तोल।“
इस पंक्ति में मीरा बताती हैं कि लोग उनके बारे में अलग-अलग बातें करते हैं, जैसे कोई उन्हें तिरस्कार करता है तो कोई उनकी प्रशंसा करता है। लेकिन उन्होंने इन बातों की परवाह किए बिना गोविंद के प्रति अपनी भक्ति का निर्णय लिया।
पंक्ति 4:
“कोई कहे काठो, कोई कहे गोरों, लियो री अमोलक मोल।”
मीरा कहती हैं कि कुछ लोग गोविंद को सांवला कहते हैं, तो कुछ गोरा। लेकिन उनके लिए गोविंद का मोल अमूल्य है, उनका रूप या रंग नहीं, बल्कि उनका प्रेम महत्वपूर्ण है।
पंक्ति 5:
“कोई कहे घरमें, कोई कहे बनमें, राधाके संग किलोल।”
मीरा बताती हैं कि कुछ लोग कहते हैं कि गोविंद घर में हैं, तो कुछ कहते हैं कि वे वन में राधा के संग खेल रहे हैं। लेकिन मीरा के लिए हर जगह गोविंद ही हैं, उनके साथ रहने की अनुभूति ही सबसे महत्वपूर्ण है।
पंक्ति 6:
“मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, आवत प्रेमके मोल।”
मीरा अंत में कहती हैं कि उनके प्रभु गिरिधर (कृष्ण) केवल प्रेम के द्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं। प्रेम ही उनका असली मूल्य है, और मीरा ने अपना सब कुछ इसी प्रेम के लिए समर्पित कर दिया है।
सार: इस पद में मीरा जी ने कृष्ण के प्रति अपने असीम प्रेम और समर्पण को व्यक्त किया है। वह बताती हैं कि समाज की बातों की परवाह किए बिना, उन्होंने अपने प्रभु को अपनाया। यह पद प्रेम, भक्ति और ईश्वर के प्रति समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
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