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भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बोलने वाली प्रेरणादायक सेलिब्रिटी महिलाएँ

Indian celebrity women including Deepika Padukone, Kalki Koechlin, Ileana D'Cruz and Samantha Ruth Prabhu speaking openly about mental health awareness in India

आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा बढ़ी है, लेकिन अभी भी समाज में इसे लेकर झिझक मौजूद है। कई भारतीय अभिनेत्रियों ने अपने व्यक्तिगत संघर्ष साझा कर इस विषय को मुख्यधारा में लाने का साहस दिखाया है।

Deepika Padukone – अवसाद से संघर्ष की कहानी

दीपिका पादुकोण ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि वे एक समय गंभीर अवसाद (डिप्रेशन) से गुज़री थीं। उन्होंने बताया कि अत्यधिक थकान, निराशा और खालीपन की भावना उनके जीवन का हिस्सा बन गई थी।

उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए The Live Love Laugh Foundation की स्थापना की। यह संस्था लोगों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता और परामर्श उपलब्ध कराती है।

प्रेरणा: सफलता के शिखर पर पहुँचे व्यक्ति भी मानसिक संघर्ष से गुजर सकते हैं। सहायता लेना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस का प्रतीक है।

Anushka Sharma : चिंता विकार पर खुलापन

अनुष्का शर्मा ने अपने चिंता विकार (एंग्ज़ायटी डिसऑर्डर) के बारे में खुलकर चर्चा की। उन्होंने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शारीरिक स्वास्थ्य।

उन्होंने लोगों को यह संदेश दिया कि चिकित्सकीय परामर्श और उपचार लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।

प्रेरणा: मानसिक रोगों को छिपाने के बजाय स्वीकार करना ही स्वस्थ जीवन की ओर पहला कदम है।

कल्कि कोचलिन – प्रसवोत्तर अवसाद पर खुला संवाद

कल्कि कोचलिन ने स्वीकार किया कि वे प्रसवोत्तर अवसाद (Postpartum Depression) से पीड़ित थीं। हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा:

“लोग इस बारे में बात ही नहीं करते कि यह कितना मुश्किल होता है। मुझे प्रसवोत्तर अवसाद हुआ था। इसे केवल अत्यधिक थकावट कहना सही नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को हर रात हर दो घंटे में जगाया जाए, तो वह अवसादग्रस्त हो ही जाएगा। नींद की कमी एक प्रकार की यातना है।”

उन्होंने बताया कि पहली बार माँ बनने के कारण उन्हें समझ नहीं आया कि यह सामान्य स्थिति है या नहीं।
उन्होंने कहा:

“अगर हर महिला इससे गुजरती है, तो हम इसके बारे में बात क्यों नहीं करते?”

बाद में उन्होंने अपने अनुभवों को अपनी ग्राफिक संस्मरण पुस्तक The Elephant in the Womb में दर्ज किया।

संदेश: मातृत्व सुखद है, लेकिन इसके साथ मानसिक संघर्ष भी वास्तविक हैं।

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इस अनोखी ग्राफिक कहानी में, आखिरकार हमारे पास प्रेग्नेंसी और पेरेंटिंग पर वह साफ़, मज़ेदार और ऐसी किताब है जिसका इंतज़ार माँएँ, होने वाली माँएँ, और माँ बनने के बारे में सोचने वाला कोई भी इंसान कर रहा था। एक्टर और राइटर कल्कि कोचलिन ने बहुत सी ऐसी बातों के बारे में खुलकर बात की है जिनके बारे में हम बात नहीं करते – अबॉर्शन और बिना शादी के प्रेग्नेंसी का सोशल स्टिग्मा, प्रेग्नेंसी का शरीर पर पड़ने वाला असर, बच्चे को जन्म देने का इमोशनल उतार-चढ़ाव और हाँ, इस बहुत अजीब दुनिया में एक असली छोटे बच्चे को लाने की खुशी और आनंद के अनगिनत पल।

Ileana D’Cruz – अवसाद और शारीरिक असुरक्षा से संघर्ष

फिल्म बर्फी की अभिनेत्री इलियाना डी’क्रूज़ ने 2017 में स्वीकार किया कि वे अवसाद और बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (BDD) से जूझ रही थीं।

मानसिक स्वास्थ्य के 21वें विश्व सम्मेलन में उन्होंने भावुक होकर कहा:

“मैं हमेशा अपने शरीर को लेकर असुरक्षित महसूस करती थी। लोग मुझे मेरे शारीरिक रूप के कारण चिढ़ाते थे। मैं हमेशा उदास और निराश रहती थी। एक समय ऐसा भी आया जब मेरे मन में आत्महत्या के विचार आए।”

उन्होंने आगे कहा:

“सब कुछ तब बदला जब मैंने स्वयं को स्वीकार किया। अवसाद से लड़ने का पहला कदम स्वयं को स्वीकार करना है।”

मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता के लिए उन्हें “वुमन ऑफ सब्सटेंस अवॉर्ड” से सम्मानित किया गया। उन्होंने लोगों से सहायता लेने में संकोच न करने का आग्रह किया।

संदेश: आत्म-स्वीकृति ही उपचार की शुरुआत है।

Samantha Ruth Prabhu – बीमारी और भावनात्मक संघर्ष पर साहस

अभिनेत्री सामंथा रुथ प्रभु ने इंस्टाग्राम पर खुलासा किया कि वे मायोसाइटिस (Myositis) नामक एक स्व-प्रतिरक्षित (Autoimmune) बीमारी से पीड़ित हैं।

फिल्म यशोदा की रिलीज़ से पहले उन्होंने लिखा:

“कुछ महीने पहले मुझे मायोसाइटिस नामक एक स्व-प्रतिरक्षित बीमारी का पता चला। मैं इसे तब साझा करना चाहती थी जब यह पूरी तरह ठीक हो जाती, लेकिन इसमें समय लग रहा है। मैंने समझा कि हमें हमेशा मजबूत दिखने की आवश्यकता नहीं होती। कमजोरी स्वीकार करना भी साहस है। डॉक्टरों को विश्वास है कि मैं पूरी तरह स्वस्थ हो जाऊँगी। अच्छे और बुरे दिन आते हैं — शारीरिक और भावनात्मक दोनों रूप से। लेकिन हर दिन मुझे स्वस्थ होने के करीब ले जा रहा है।”

उन्होंने अंत में लिखा —
“यह समय भी बीत जाएगा।”

संदेश: बीमारी केवल शारीरिक नहीं, भावनात्मक संघर्ष भी लाती है। स्वीकार करना ही शक्ति है।

निष्कर्ष

इन प्रेरणादायक महिलाओं ने साबित किया कि:

  • मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना आवश्यक है।
  • प्रसवोत्तर अवसाद, बॉडी इमेज समस्याएँ और ऑटोइम्यून बीमारियाँ वास्तविक हैं।
  • सहायता लेना कमजोरी नहीं, बल्कि जागरूकता है।
  • आत्म-स्वीकृति ही उपचार का पहला कदम है।

आज जरूरत है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही गंभीरता से लें जितनी शारीरिक स्वास्थ्य को देते हैं।

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