नवरात्रि का पावन पर्व मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा करते हैं जिससे जीवन में शक्ति, साहस, धन, स्वास्थ्य और सफलता प्राप्त होती है। मां शैलपुत्री पूजा से शुरू होकर मां सिद्धिदात्री तक की यह यात्रा मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक कुंडलिनी जागरण का प्रतीक है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार मां शैलपुत्री से मां सिद्धिदात्री तक की पूजा आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है, जो मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक कुंडलिनी शक्ति के जागरण को दर्शाती है।
अगर आप घर पर सही विधि से नवरात्रि पूजा करना चाहते हैं तो यह लेख आपके लिए पूरी गाइड है। इसमें आपको मिलेगा:
- 9 देवियों की पूरी कथा
- पूजा विधि
- मंत्र
- भोग
- शुभ रंग
- पूजा के लाभ
- कन्या पूजन विधि
यहां पढ़े : मां दुर्गा के नौ अवतार कौन से हैं? उनके नाम और महत्व
नवरात्रि में नवदुर्गा पूजा क्यों की जाती है
नवदुर्गा पूजा का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मशक्ति जागरण भी है।
नवदुर्गा पूजा के मुख्य लाभ:
✔ नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है
✔ आत्मविश्वास बढ़ता है
✔ मानसिक शांति मिलती है
✔ आर्थिक समस्याएं कम होती हैं
✔ मनोकामनाएं पूरी होती हैं
नवरात्रि में नवदुर्गा पूजा की सामान्य विधि
नवरात्रि पूजा हर दिन लगभग एक जैसी होती है, केवल देवी का स्वरूप बदलता है। नवरात्रि की शुरुआत घटस्थापना से होती है (प्रतिपदा तिथि पर शुभ मुहूर्त में)। सामग्री: कलश, गंगाजल, अक्षत, रोली, मौली, नारियल, सुपारी, जौ, मिट्टी का बर्तन। दैनिक पूजा स्टेप्स:
- स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें।
- मंदिर साफ करें, देवी की तस्वीर/मूर्ति स्थापित करें।
- दीपक जलाएं (घी का), अगरबत्ती लगाएं।
- फूल, अक्षत, रोली चढ़ाएं।
- दिन की देवी का मंत्र जप (108 बार) और आरती करें।
- भोग लगाएं, फिर प्रसाद ग्रहण करें।
- दुर्गा चालीसा या सप्तशती का पाठ करें।
अष्टमी/नवमी पर कन्या पूजन अवश्य करें (9 कन्याओं को हलवा-पूरी-चने चढ़ाएं, चूड़ी-कपड़े-दक्षिणा दें)। अंत में हवन कर पूर्णाहुति दें।
आवश्यक सामग्री
- कलश
- गंगाजल
- नारियल
- जौ
- अक्षत
- रोली
- लाल कपड़ा
- फूल
- दीपक
मां शैलपुत्री पूजा विधि (Day 1 Navratri)
मां शैलपुत्री का महत्व : मां शैलपुत्री नवदुर्गा का पहला स्वरूप हैं। इन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। मूलाधार चक्र की स्वामिनी। स्थिरता, स्वास्थ्य और वैवाहिक सुख देती हैं।
विशेषताएं:
- वाहन – बैल
- हाथ – त्रिशूल और कमल
- चक्र – मूलाधार चक्र
मां शैलपुत्री की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर आत्मदाह कर लिया था। अगले जन्म में उन्होंने हिमालय के घर जन्म लिया और शैलपुत्री कहलायीं। सती हिमालय के घर शैलपुत्री के रूप में जन्म लीं। फिर पार्वती बनीं और शिव से विवाह किया। यह रूप शक्ति की शुरुआत का प्रतीक है।
वाहन: वृषभ (बैल) | आयुध: त्रिशूल, कमल। रंग: पीला/सफेद।
कहानी: सती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह किया। शिव के क्रोध से यज्ञ नष्ट हुआ।
पूजा विधि: कलश स्थापना के बाद सफेद/पीले चूड़े चढ़ाएं। केसर से “शं” लिखें। सफेद फूल चढ़ाएं। भोग: बर्फी, खीर, दूध से बनी मिठाई, सफेद पुष्प।
मंत्र: ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः ध्यान मंत्र: वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥ पूजा विधि
- सफेद फूल चढ़ाएं
- घी का दीपक जलाएं
- दूध की मिठाई चढ़ाएं
मां ब्रह्मचारिणी पूजा (Day 2)
महत्व: तपस्या की देवी। स्वाधिष्ठान चक्र जागृत करती हैं। धैर्य, संयम और ज्ञान देती हैं।
वाहन: कोई नहीं (पदचारी) | आयुध: कमंडलु, जपमाला। रंग: लाल/हरा।
कहानी: हिमालय की पुत्री पार्वती ने नारद मुनि के उपदेश से शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की – 1000 वर्ष फलाहार, फिर बेल पत्र, फिर निराहार। शरीर क्षीण हो गया, देवताओं ने प्रशंसा की और शिव प्राप्त हुए। नाम “अपर्णा” भी पड़ा।
पूजा विधि: लाल चूड़े और कमंडलु चढ़ाएं। मिश्री अर्पित करें। भोग: मिश्री, चीनी, फल, पंचामृत। मंत्र: ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः
मां चंद्रघंटा (तृतीय नवरात्रि – Day 3)
महत्व: साहस और शौर्य की देवी। मणिपुर चक्र जागृत। भय और बाधाएं नष्ट करती हैं। वाहन: सिंह | आयुध: 10 हथियार (त्रिशूल, खड्ग, घंटा आदि)। रंग: ग्रे/नीला।
कहानी: मस्तक पर अर्धचंद्र (घंटे जैसा)। महिषासुर वध के समय यह रूप धारण किया। घंटे की ध्वनि से नकारात्मक शक्तियां भाग जाती हैं।
पूजा विधि: घंटा बजाएं, लाल/नीले फूल चढ़ाएं। भोग: खीर, दूध की मिठाई। मंत्र: ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः
मां कूष्मांडा (चतुर्थ नवरात्रि – Day 4)
महत्व: ब्रह्मांड की रचयिता। अनाहत चक्र जागृत। स्वास्थ्य, उम्र और सिद्धियां देती हैं। वाहन: सिंह | आयुध: 8 हथियार, कमंडलु, माला। रंग: नारंगी।
कहानी: अंधकार में मुस्कान से ब्रह्मांड (अंड) की रचना की। सूर्य की शक्ति का स्रोत।
पूजा विधि: नारंगी चूड़े, मालपुआ चढ़ाएं। भोग: मालपुआ, पेठा। मंत्र: ॐ देवी कूष्मांडायै नमः
मां स्कंदमाता (पंचमी नवरात्रि – Day 5)
महत्व: स्कंद (कार्तिकेय) की माता। विशुद्ध चक्र जागृत। परिवार की रक्षा और ज्ञान देती हैं। वाहन: सिंह | आयुध: कमल, बाल स्कंद गोद में। रंग: सफेद।
कहानी: पार्वती का रूप जो स्कंद को गोद में लिए बैठी हैं।
पूजा विधि: सफेद फूल, केला चढ़ाएं। भोग: केला, पीले फूल। मंत्र: ॐ देवी स्कंदमतायै नमः
मां कात्यायनी (षष्ठी नवरात्रि – Day 6)
महत्व: महिषासुर मर्दिनी। आज्ञा चक्र जागृत। संकट निवारक, विवाह और विजय देती हैं। वाहन: सिंह | आयुध: तलवार, कमल। रंग: लाल।
कहानी: कात्यायन ऋषि की तपस्या से जन्म। देवताओं की ऊर्जा से बनीं और महिषासुर का वध किया।
पूजा विधि: लाल हिबिस्कस फूल, शहद चढ़ाएं। भोग: शहद, लाल मिठाई। मंत्र: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः
मां कालरात्रि (सप्तमी नवरात्रि – Day 7)
महत्व: अंधकार और भय नाशक। सहस्रार चक्र जागृत। शत्रु और कष्ट नष्ट करती हैं। वाहन: गधा | आयुध: त्रिशूल, खड्ग। रंग: नीला/काला।
कहानी: तामसी रूप में अंधकार भरने के लिए प्रकट। बाल बिखरे, भयावह लेकिन शुभ।
पूजा विधि: शाम को विशेष पूजा, तिल-गुड़ चढ़ाएं। भोग: गुड़, तिल। मंत्र: ॐ देवी कालरात्र्यै नमः
मां महागौरी (अष्टमी नवरात्रि – Day 8)
महत्व: शुद्धता की देवी। बिंदु चक्र जागृत। पाप नाश, सौभाग्य देती हैं। वाहन: बैल | आयुध: त्रिशूल, डमरू। रंग: गुलाबी/सफेद।
कहानी: तपस्या के बाद शिव ने गंगा जल से काला शरीर धोया, गोरा रूप मिला।
पूजा विधि: कन्या पूजन का दिन। सफेद चूड़े, नारियल चढ़ाएं। भोग: नारियल की मिठाई। मंत्र: ॐ देवी महागौर्यै नमः
मां सिद्धिदात्री (नवमी नवरात्रि – Day 9)
महत्व: सभी सिद्धियों की दाता। मोक्ष देती हैं। कुंडलिनी यात्रा पूर्ण। वाहन: सिंह | आयुध: चक्र, गदा, शंख, कमल। रंग: बैंगनी/आसमानी।
कहानी: शिव ने इनसे सिद्धियां प्राप्त कर अर्धनारीश्वर रूप धारण किया।
पूजा विधि: हवन करें, फल-खीर चढ़ाएं। भोग: खीर, तिल लड्डू। मंत्र: ॐ ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धिदात्र्यै नमः
नवरात्रि पूजा के लाभ और टिप्स
- सभी 9 दिनों की पूजा से नकारात्मक ऊर्जा दूर, मनोकामना पूर्ण।
- व्रत रखें (फलाहार), दुर्गा सप्तशती पाठ करें।
- दशमी पर विसर्जन या हवन।
नवरात्रि में क्या नहीं करें
नवरात्रि के पावन पर्व में मां दुर्गा की आराधना के साथ-साथ संयम, शुद्धता और अनुशासन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। व्रत रखने वाले भक्तों को कई नियमों का पालन करना पड़ता है, और कुछ कार्यों से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। अगर इनका उल्लंघन होता है तो व्रत टूट सकता है या पूजा का पूरा फल नहीं मिलता, ऐसा पारंपरिक मान्यताओं में कहा जाता है।
नीचे नवरात्रि में क्या नहीं करना चाहिए की पूरी लिस्ट दी गई है (शारदीय/चैत्र दोनों नवरात्रि के लिए लागू)। ये नियम ज्यादातर उत्तर भारत की परंपराओं पर आधारित हैं, कुछ क्षेत्रों में थोड़े बदलाव हो सकते हैं।
1. खान-पान से संबंधित वर्जनाएं (सबसे महत्वपूर्ण)
- मांसाहारी भोजन (चिकन, मटन, मछली, अंडा, मटन आदि) बिल्कुल न खाएं।
- प्याज और लहसुन का सेवन वर्जित है (तामसिक माने जाते हैं)।
- शराब, तंबाकू, नशीले पदार्थ और सिगरेट/धूम्रपान से दूर रहें।
- सामान्य अनाज जैसे गेहूं, चावल (सामा के चावल को छोड़कर), दालें, मैदा, सूजी, बेसन आदि न खाएं।
- सामान्य नमक (सेंधा नमक इस्तेमाल करें)।
- तामसिक/राजसिक भोजन – ज्यादा तीखा, तला-भुना, प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा मीठा या ज्यादा नमकीन चीजें न खाएं।
- नींबू काटना – कई परंपराओं में व्रत के 9 दिन नींबू नहीं काटते।
- खाली पेट कुछ चीजें – जैसे केला, चाय, दही (कुछ लोग मानते हैं कि गैस/एसिडिटी हो सकती है)।
2. व्यक्तिगत देखभाल और सौंदर्य से संबंधित
- बाल कटवाना, दाढ़ी-मूंछ बनवाना या ट्रिम करना नहीं चाहिए।
- नाखून काटना वर्जित माना जाता है।
- गंदे या बिना धुले कपड़े नहीं पहनने चाहिए – हमेशा साफ, शुद्ध वस्त्र (विशेषकर सफेद/लाल/पीले) पहनें।
- चमड़े की चीजें (बेल्ट, जूते, पर्स आदि) का इस्तेमाल न करें (कुछ लोग मानते हैं)।
3. व्यवहार और आचरण से संबंधित
- क्रोध, झगड़ा, अपशब्द, झूठ बोलना या नकारात्मक विचार बिल्कुल न रखें।
- ब्रह्मचर्य का पालन – शारीरिक संबंधों से परहेज करें।
- दिन में सोना (विशेषकर बिस्तर पर) नहीं चाहिए – रात में ही सोएं।
- अनावश्यक बातचीत या गपशप से बचें – मन को शांत और भक्ति में लगाए रखें।
4. पूजा और घर से संबंधित
- अखंड ज्योति या कलश को घर खाली छोड़कर बाहर न जाएं (अगर जल रही हो)।
- पूजा में लापरवाही न करें – समय पर पूजा, आरती, भोग अवश्य लगाएं।
- घर में गंदगी न रखें – रोज साफ-सफाई रखें।
- सिलाई-कढ़ाई जैसे काम (कुछ परंपराओं में) न करें।
5. अन्य सामान्य वर्जनाएं
- बिस्तर पर सोना – जमीन पर या सादे आसन पर सोना बेहतर माना जाता है (लक्जरी कम करने के लिए)।
- व्रत बीच में तोड़ना – अगर 9 दिन का व्रत रखा है तो पूरा करें।
- पूजा स्थल को अपवित्र हाथों से छूना – हाथ धोकर ही स्पर्श करें।
ये नियम मुख्य रूप से शुद्धता और सात्विकता बनाए रखने के लिए हैं। व्रत का मुख्य उद्देश्य शरीर-मन की शुद्धि, कुंडलिनी जागरण और मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करना है। अगर आप फलाहारी या एक समय भोजन करते हैं, तो स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें – ज्यादा कमजोरी न होने दें।
नोट: ये नियम पारंपरिक और धार्मिक ग्रंथों (दुर्गा सप्तशती, पुराण आदि) पर आधारित हैं। हर परिवार/क्षेत्र में थोड़े अंतर हो सकते हैं, इसलिए घर के बड़े-बुजुर्गों से भी सलाह लें।
Conclusion
नवदुर्गा पूजा हमें सिखाती है कि जीवन में शक्ति, धैर्य और विश्वास से हर कठिनाई को पार किया जा सकता है। यदि सच्ची श्रद्धा से मां दुर्गा की पूजा की जाए तो जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
नवरात्रि की शुभकामनाएं।

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