डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद की शपथ को एक साल पूरा

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President Donald J. Trump is return : डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद की शपथ को 20 जनवरी 2025 को एक साल पूरा हो गया। यह उनके दूसरे कार्यकाल की शुरुआत थी। इस मौके पर व्हाइट हाउस में हुए बदलावों, नई नीतियों और अहम घटनाओं को याद किया गया। ट्रंप ने “अमेरिका फर्स्ट” के नारे के साथ देश में बदलाव लाने और अमेरिका को मजबूत बनाने की बात कही। वहीं, कुछ विपक्षी नेताओं ने उनकी नीतियों की आलोचना की, खासकर विविधता, समानता और समावेशन (DEI) से जुड़े कार्यक्रमों को खत्म करने को लेकर।

2024 के चुनावों में भारी जीत के बाद, राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रम्प व्हाइट हाउस लौट रहे हैं ताकि अपनी पिछली सफलताओं को आगे बढ़ा सकें और अपने जनादेश का उपयोग करते हुए कट्टरपंथी वामपंथियों की चरमपंथी नीतियों को खारिज कर सकें, साथ ही अमेरिकी लोगों के जीवन स्तर में ठोस सुधार ला सकें।

इसमें अंतहीन युद्धों को रोकना, देश की सीमाओं की रक्षा करना और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की क्षमता को उजागर करना शामिल है, ताकि सभी अमेरिकियों को अपने-अपने तरीके से अमेरिकी सपने को साकार करने का अवसर मिल सके।

ट्रंप की सरकार का सबसे बड़ा फोकस अमेरिका फर्स्ट नीति पर

डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण को एक साल पूरा हो गया है। उन्होंने 20 जनवरी, 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप की सरकार का सबसे बड़ा फोकस अमेरिका फर्स्ट नीति पर रहा। इस दौरान उन्होंने व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और टेक्नोलॉजी क्षेत्रों में कई ऐसे कदम उठाए, जो उनके समर्थकों को तो पसंद आए, लेकिन विपक्षी दलों और आलोचकों ने इसे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और वैश्विक साझेदारियों के लिए नुकसानदायक बताया।

इस एक साल के दौरान उनकी सरकार ने घरेलू और विदेश नीति में कई बड़े और विवादित फैसले लिए, जिनका असर न केवल अमेरिका, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी देखा गया। वहीं ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति का उद्देश्य भले ही देश के हितों को प्राथमिकता देना था, लेकिन इसके दुष्परिणाम अमेरिकियों की जिंदगी में दिखाई देने लगे हैं। व्यापार, आव्रजन और विदेश नीति में सख्त रुख ने जहां वैश्विक स्तर पर अमेरिका की छवि को बदला, वहीं घरेलू मोर्चे पर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां भी बढ़ीं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका फर्स्ट नीति ने अल्पकालिक राजनीतिक लाभ दिए, लेकिन लंबे समय में आम अमेरिकियों की रोजमर्रा की परेशानियां बढ़ा दीं। इधर ट्रंप ने रक्षा बजट बढ़ाया और कई सुरक्षा सहयोग को मजबूत किया। साथ ही, कुछ देशों के साथ रक्षा सौदों और हथियारों के निर्यात को तेज किया गया। वहीं सेना की ताकत बढ़ाने के लिए बजट और संसाधन बढ़ाए गए। समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक तट रेखा को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

ट्रंप की नीतियों से अमेरिकियों की बढ़ीं मुश्किलें

  • महंगाई में इजाफा: अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत चीन और अन्य देशों पर लगाए गए टैरिफ से आयातित सामान महंगा हुआ। इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू उपकरण, कपड़े और आटो पार्ट्स के दाम बढ़े, जिससे आम उपभोक्ताओं पर सीधा आर्थिक बोझ पड़ा।
  • रोजगार के अवसर घटे: सख्त व्यापार नीतियों और वैश्विक तनाव के कारण कुछ उद्योगों में निवेश कम हुआ। इससे मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात से जुड़े क्षेत्रों में नौकरियों पर असर पड़ा।
  • श्रम संकट गहराया: इमिग्रेशन नीति में सख्ती से कृषि, निर्माण और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में कामगारों की कमी हुई। इससे सेवाएं महंगी और धीमी हो गइ ।
  • उपभोक्ताओं को कम विकल्प: अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों और उत्पादों पर निर्भरता घटाने से बाजार में विकल्प सीमित हुए, जिससे प्रतिस्पर्धा कम और कीमतें ज्यादा रहीं।
  • वैश्विक रिश्तों में तनाव: सहयोगी देशों से व्यापारिक टकराव बढ़ने के कारण अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी बाजार मुश्किल हुए, जिसका असर आम नागरिकों की आमदनी पर पड़ा।

कई देशों को दिया झटका

चीन के खिलाफ कड़े प्रतिबंध : ट्रंप ने चीन को तकनीकी और आर्थिक मोर्चे पर टक्कर देने के लिए टैरिफ, एक्सपोर्ट कंट्रोल और चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध बढ़ाए। इससे चीन की टेक कंपनियों और निर्यात को बड़ा झटका लगा और दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण बने।
रूस के साथ रिश्तों में फिर से कड़े रुख : रूस पर नए आर्थिक और सैन्य प्रतिबंध लगाए गए। यूके्रन पर बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने रूस के खिलाफ कई कदम उठाकर उसकी पैंतरेबाजी को सीमित करने की कोशिश की।
ईरान पर दबाव बढ़ाया : ईरान के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों और तेल व्यापार पर रोक को और कड़ा किया गया।
नाटो देशों से खर्च बढ़ाने की मांग: ट्रंप ने नाटो देशों से अधिक रक्षा खर्च की मांग की और कई बार खुलकर कहा कि अमेरिका अकेले सुरक्षा का बोझ नहीं उठाएगा।
इजराइल और अरब देशों के रिश्तों में बदलाव: अमेरिका ने कुछ देशों के साथ रणनीतिक समझौतों को आगे बढ़ाया, जबकि कुछ मुद्दों पर इजराइल की ओर बढ़कर कई देशों को आश्चर्य में डाल दिया।

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