The Body Doesn’t Get Tired, the Mind Does – How to Recognize It? : ज़्यादातर लोग थकान को सीधे शरीर से जोड़ देते हैं। लोग सोचते हैं नींद पूरी नहीं हुई होगी, काम ज़्यादा हो गया होगा या उम्र का असर होगा. लेकिन जब पूरी नींद लेने, आराम करने और कुछ न करने के बाद भी थकान दूर न हो, तब यह संकेत है कि समस्या शरीर में नहीं, मन में है। जी हां, मन भी थक सकता है.
क्या होती है मन की थकान (Mental-Fatigue)?
जब दिमाग लगातार किसी बात या चिंता को लेकर लगातार सोचता रहता है और हमारी भावनाएँ दबी रहती हैं और भीतर ही भीतर एक तनाव जमा होता जाता है। इससे शरीर तो थकता ही साथ ही साथ मन भी थक जाता है. कई बार हमको लगता है कि “शरीर कुछ नहीं कर रहा, फिर भी बहुत थका हुआ लग रहा है।” यह थकान ही मन की थकान होती है. मगर मन की थकान (Mental-Fatigue) और शरीर की थकान में अन्तर होता है. आइए समझते हैं कि दोनों में अन्तर क्या है?
मन की थकान और शरीर की थकान में अंतर
शरीर की थकान काम करने के बाद होती है, शरीर आराम या नींद से ठीक हो जाती है जिससे अगली सुबह हल्कापन महसूस होता है। जबकि मन की थकान बिना ज़्यादा काम किए भी होती है और आराम के बाद भी बनी रहती है बल्कि आप सोकर सुबह उठते है तो भी भारीपन लगता है।
कैसे पहचानें कि थकान मन की है?
अब सवाल उठता है कि हम कैसे पहचानें कि यह थकान शरीर की थकान है या मन की, मन की थकान जानने के लिए कुछ बातें जानना जरूरी हैं जैसे :-
- आराम के बाद भी ऊर्जा न लौटे
अगर छुट्टी लेने या पूरी नींद के बाद भी ताज़गी न मिले, तो यह मन की थकान का संकेत है। - छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन
बिना कारण गुस्सा आना या बात-बात पर मन खराब होना कृ यह मानसिक दबाव का परिणाम है। - हर समय बोझ सा महसूस होना
काम का बोझ नहीं, बल्कि जीवन का बोझ लगने लगे। - मन किसी काम में न लगे
जो काम पहले अच्छे लगते थे, अब उनमें रुचि न रहे। - शरीर में दर्द, लेकिन जाँच सामान्य
सिर, गर्दन, पीठ या पेट में दर्द, लेकिन रिपोर्ट सामान्य आए कृ यह मन का असर हो सकता है।
मन क्यों थकता है? Why does the mind get tired?
आखिर शरीर न थकने के बाद भी मन शरीर को कैसे थकाना है यह प्रश्न सभी के मन उठता है, जब हम दिन भर आराम से रहे कोई भी भारी काम भी नहीं किया फिर भी शरीर को थकावट क्यों महसूस हो रही है, यह शरीर की थकावट शरीर की नहीं होती बल्कि मन की होती है। आइए जानते हैं आखिर यह मन क्यों थकाता है?
भावनाएँ दबाने से – जब हम दुख, डर या नाराज़गी को व्यक्त नहीं करते, तो वही भावनाएँ मन को थका देती हैं। क्यों, दुख, डर या नाराज़गी को अगर हम बाहर नहीं निकालते, तो वह भावना मन में ही सक्रिय रहती है।
वह कहीं जाती नहीं, बस भीतर दब जाती हैकृऔर हर दबाव ऊर्जा खींचता है। जैसे हवा भरे गुब्बारे को लगातार दबाते रहें, वह थकाता भी है और फटने के करीब भी ले जाता है।
जब हम भावना व्यक्त नहीं करते, तो मन को दो काम एक साथ करने पड़ते हैंः अंदर उठ रही भावना को दबाना, बाहर सामान्य दिखने की कोशिश करना, यह लगातार चलने वाली आंतरिक लड़ाई मन को चुपचाप थका देती है।
हर समय मज़बूत बने रहने से – हर किसी के लिए मजबूत दिखते-दिखते, अंदर का इंसान टूटने लगता है।
हम किसी भी कमजोर नहीं दिखना चाहते हैं सभी के सामने एक मजबूत इंसान बने रहना चाहते हैं बस इस झूठी मजबूती के कारण हम मानसिक रूप से थक जाते हैं।
लगातार तुलना से – दूसरों की ज़िंदगी से खुद की तुलना मन को चुपचाप कमजोर करती है।
जब हम हर समय अपने को दूसरों से तुलना करते रहते हैं तो मन कई योजनाओं पर एक साथ काम करने लगता हैं जिससे मन में बिना बात का भारीपन महसूस होता है हालांकि जिस समय हम योजना बना रहे होते हैं उस समय यह भारीपन नहीं होता है लेकिन कुछ समय बाद बिना बात के भारीपन आ जाता है।
सब ठीक है’ कहने की आदत – जब वास्तव में सब ठीक नहीं होता, लेकिन हम मानने से इंकार करते हैं।
जब इंसान दोहरी जिंदगी जीता है और खुद की परिस्थिति को अस्वीकार करता है और दूसरों के साथ खुद से भी सब ठीक है ऐसा कहता रहता है जबकि भीतर से वो जानता है कि कुछ भी ठीक नहीं है तो मन कंफूज हो जाता है तो मन मे एक भारीपन आ जाता है।
मन की थकान को हल्का कैसे करें? How to relieve mental fatigue?
- खुद से सच बोलिए
अपने मन से पूछिए कृ “मैं वास्तव में कैसा महसूस कर रहा हूँ?” - भावनाओं को जगह दीजिए
रोना, लिखना, किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना कृ ये कमजोरी नहीं हैं। - हर समय उपलब्ध न रहें
थोड़ा समय खुद के लिए निकालना ज़रूरी है। - मौन को अपनाइए
कुछ देर बिना मोबाइल, बिना बातचीत कृ सिर्फ़ खुद के साथ बैठना मन को राहत देता है। - ज़रूरत हो तो सहायता लें
काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना समझदारी है, शर्म नहीं।
निष्कर्ष : जब दुख, डर या नाराज़गी को हम व्यक्त नहीं करते, तो वे भावनाएँ भीतर ही भीतर जमा होकर मन पर दबाव बनाती रहती हैं। मन उन्हें लगातार संभालने में ऊर्जा खर्च करता है, जिससे थकान, बेचैनी और भारीपन महसूस होता है। भावनाओं को स्वीकार करना और सुरक्षित रूप से व्यक्त करना मन को हल्का करता है और वास्तविक आराम देता है।

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