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Navratri Special: अक्षरा सिंह की फिल्म ‘अम्बे है मेरी मां’ में दिखेगा भक्ति और न्याय का संगम

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अक्षरा सिंह अपनी नई फिल्म ‘अम्बे है मेरी मां’ के साथ बड़े पर्दे पर वापसी कर रही हैं—और इस बार कहानी सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक मजबूत सामाजिक संदेश भी लेकर आई है।

नवरात्रि के मौके पर खास पेशकश

सबसे पहले बात करें इस खास टाइमिंग की—
19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च 2026 तक चलने वाले चैत्र नवरात्रि के दौरान इस फिल्म का रिलीज होना इसे और भी खास बना देता है।

यही वजह है कि फिल्म में देवी मां की भक्ति, चमत्कार और आस्था का गहरा रंग देखने को मिलेगा।

दमदार स्टारकास्ट और किरदार

फिल्म में जहां अक्षरा सिंह मुख्य भूमिका निभा रही हैं, वहीं पाखी हेगड़े मां अम्बे के दिव्य रूप में नजर आएंगी।

इसके अलावा फिल्म में कई जाने-माने कलाकार शामिल हैं:

  • राकेश बाबू
  • देव सिंह
  • प्रेम दुबे
  • विद्या सिंह
  • रामसुजान सिंह
  • निशा सिंह, निशा तिवारी
  • इन्द्रसेन सिंह, सुवेश
  • प्रीति राज, मंटू, राहुल शर्मा
  • प्रिया पारुल, शीतल यादव, प्रिया चौधरी
  • बाल कलाकार: स्वस्तिका राय, गुनगुन

यानी साफ है—फिल्म में एक्टिंग का पूरा दम देखने को मिलेगा।

ट्रेलर में दिखी दर्द और भक्ति की कहानी

हाल ही में रिलीज हुआ 4 मिनट 52 सेकंड का ट्रेलर काफी इमोशनल और असरदार है।

सबसे पहले, कहानी अक्षरा के बचपन से शुरू होती है—
जहां उसे अपने ही घर में प्यार नहीं, बल्कि सिर्फ काम और ताने मिलते हैं।

लेकिन दूसरी तरफ, उसकी अटूट भक्ति मां अम्बे के प्रति उसे कभी अकेला नहीं छोड़ती। यही भक्ति उसके जीवन की सबसे बड़ी ताकत बनती है।


भोजपुरी सिनेमा के सुपरहिट एक्ट्रेस अक्षरा सिंह बहुत दिन बाद एगो दमदार फिलिम ‘अम्बे है मेरी मां’ लेके आ रहल बाड़ी। एह फिलिम में अक्षरा लीड रोल में बाड़ी, जबकि पाखी हेगड़े मां अम्बे के रूप में नजर आवे वाली बाड़ी।

ई फिलिम सिर्फ मनोरंजन ना, बलुक एगो मजबूत मैसेज भी देवे वाली बा। ई फिलिम के कहानी एगो अइसन लइकी पर आधारित बा, जेकर मां अम्बे पर अटूट भरोसा बा, आ ओही भक्ति के चलते मां अम्बे हर मुश्किल में ओकर साथ निभावे ली। फिलिम के 4 मिनट 52 सेकंड के ट्रेलर बहुत जबरदस्त आ दिल छू लेवे वाला बा।

ट्रेलर के शुरुआत अक्षरा के बचपन से होला, जहां ओकर चाचा-चाची ओकरा से घर के सारा काम करावेलन, बाकिर ओकरा के ढंग से खाना तक ना देल जाला। बाकिर, इ सब दुख के बावजूद ऊ मां अम्बे के भक्ति में डूबल रहेली। एह भक्ति से खुश होके मां अम्बे खुद ओकर मदद करेली आ ओकरा खाना भी देली।

मां अम्बे मौसी के रूप में प्रकट हो जाली

धीरे-धीरे कहानी आगे बढ़ेला आ अक्षरा जवान हो जाली। ओकर शादी के बात शुरू होला आ एक दिन रिश्ता भी आ जाला।
एह दौरान ऊ मां अम्बे से कहेली कि “माई, रउआ हमरा बियाह में जरूर आईं।” एह पर मां अम्बे मौसी के रूप में प्रकट हो जाली आ बियाह में शामिल हो जाली।

बाकिर असली संघर्ष तब शुरू होला जब बियाह के बाद ससुराल वाला लोग के पता चलेला कि दहेज में कुछो ना मिलल बा।
एह बात पर ऊ लोग गुस्सा में आके अक्षरा के घर से निकाल देला। दुखी होके अक्षरा फेर मां अम्बे के लगे जाली आ आपन दुखड़ा सुनावेली। तब मां अम्बे चमत्कार करेली आ ससुराल के घर दहेज से भर देली।

बाकिर लालच के कोई सीमा ना होला…
जब ससुराल वाला लोग के पता चलेला कि अक्षरा के ‘मौसी’ बहुत अमीर बाड़ी, त ऊ लोग अउरी जादे मांग करे लागेला।

जब अक्षरा मना करेली, त ऊ लोग ओकरा साथ मारपीट करे लागेला। ई सब देख के मां अम्बे के गुस्सा फूट पड़ेला आ ऊ ससुराल वाला लोग के सबक सिखावेली। आखिर में फिलिम दहेज प्रथा जइसन बुराई पर जोरदार चोट मारत नजर आवेला।


शादी, दहेज और संघर्ष की कहानी

जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, अक्षरा की शादी की बात होती है।
वह मां अम्बे से प्रार्थना करती है कि वे उसकी शादी में जरूर आएं—और यहीं से कहानी में एक दिलचस्प मोड़ आता है।

मां अम्बे मौसी के रूप में उसके जीवन में प्रवेश करती हैं।

लेकिन शादी के बाद ससुराल में असली संघर्ष शुरू होता है—

  • दहेज न मिलने पर ताने
  • अपमान
  • और आखिरकार घर से निकाल दिया जाना

यहां फिल्म समाज की उस कड़वी सच्चाई को दिखाती है, जो आज भी कई घरों में मौजूद है।

मां अम्बे का चमत्कार और न्याय

जब अक्षरा टूट जाती है, तब वह मां अम्बे के पास अपनी पीड़ा लेकर जाती है।

इसके बाद कहानी में चमत्कार होता है—
मां अम्बे ससुराल को दहेज से भर देती हैं, जिससे सब हैरान रह जाते हैं।

लेकिन लालच यहीं खत्म नहीं होता…
ससुराल वाले और ज्यादा मांग करने लगते हैं और अक्षरा के साथ बुरा व्यवहार जारी रखते हैं। अंत में मां अम्बे क्रोधित होकर उन्हें सबक सिखाती हैं और दहेज प्रथा के खिलाफ एक मजबूत संदेश देती हैं।

पुरानी फिल्मों जैसा भावनात्मक टच

अगर ट्रेलर को देखें, तो साफ लगता है कि फिल्म में

  • देवी-भक्ति
  • पारिवारिक ड्रामा
  • और सामाजिक संदेश

इन तीनों का शानदार मिश्रण है।

खास बात ये है कि इसकी कहानी आपको पुरानी हिंदी फिल्मों की याद दिलाती है, जहां मनोरंजन के साथ-साथ एक सीख भी दी जाती थी।


Final Take

कुल मिलाकर, ‘अम्बे है मेरी मां’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि
आस्था, संघर्ष और न्याय की कहानी है।

नवरात्रि के पावन मौके पर रिलीज हो रही यह फिल्म दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने के साथ-साथ समाज को एक जरूरी संदेश भी देने वाली है।

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