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जोई जोई प्यारे करे सोई मोहि भावे — श्री प्रिया जी का अद्वितीय प्रेम संदेश | हित चौरासी के प्रथम पद का रहस्य

हित चौरासी के प्रथम पद ‘जोई जोई प्यारे करे सोई मोहि भावे’ पर आधारित श्री राधा-कृष्ण और श्री हित हरिवंश महाप्रभु की आध्यात्मिक चित्रकला।

“जोई जोई प्यारे करे सोई मोहि भावे…”

संसार में प्रेम की अनेक परिभाषाएँ मिलती हैं। कहीं प्रेम त्याग है, कहीं समर्पण, कहीं आकर्षण तो कहीं अधिकार। लेकिन ब्रज का प्रेम इन सबसे भिन्न है। यहाँ प्रेम का अर्थ है—प्रिय की इच्छा ही अपनी इच्छा बन जाना। जहाँ ‘मैं’ का अस्तित्व समाप्त होकर केवल ‘तुम’ ही शेष रह जाते हो।

इसी अलौकिक प्रेम का अनुपम दर्शन हमें श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा रचित ‘हित चौरासी’ के प्रथम पद में मिलता है। रसिक संतों का मत है कि यह केवल एक पद नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रेममार्ग का मूल सिद्धांत है।

विशेष बात यह भी कही जाती है कि हित चौरासी के चौरासी पदों में यह एकमात्र पद है जो स्वयं श्री प्रिया जी (श्री राधा रानी) के श्रीमुख से प्रकट हुआ है। शेष पदों में कहीं सखियाँ बोलती हैं, कहीं रसिक भक्त, तो कहीं स्वयं श्री हित हरिवंश महाप्रभु अपने अनुभव का वर्णन करते हैं। किंतु इस पद में स्वयं श्री राधा जी अपनी अंतरंग सखी से अपने हृदय का रहस्य प्रकट कर रही हैं।

यही कारण है कि रसिक परंपरा में इस पद का स्थान अत्यंत विशिष्ट माना गया है।

श्री हित हरिवंश महाप्रभु कौन थे?

श्री हित हरिवंश महाप्रभु (1502–1553 ई.) राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक तथा ब्रज के महान रसिक संतों में अग्रगण्य माने जाते हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन श्री राधा-कृष्ण के नित्य निकुंज विहार और माधुर्य रस के प्रचार में समर्पित रहा।

उन्होंने भक्ति को केवल पूजा-पाठ या वैराग्य तक सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रेम को ही परम साधना बताया। उनके अनुसार भगवान को ज्ञान, योग, तप या कर्म से नहीं, बल्कि निष्कपट और निष्काम प्रेम से पाया जा सकता है।

उनकी रचनाओं में हित चौरासी सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इसके चौरासी पद प्रेममार्ग के साधकों के लिए मार्गदर्शक माने जाते हैं। इनमें कहीं विरह है, कहीं मिलन, कहीं मान, कहीं विनय, तो कहीं ऐसा मधुर प्रेम है जिसे शब्दों में बाँध पाना कठिन है।

हित चौरासी क्या है?

हित चौरासी श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा रचित चौरासी पदों का संग्रह है। यह कोई साधारण काव्य नहीं, बल्कि ब्रज के रसिक संतों के लिए एक आध्यात्मिक निधि है।

इन पदों में श्री राधा-कृष्ण की नित्य लीलाओं, निकुंज विहार, सखी भाव, प्रेम की सूक्ष्म अवस्थाओं और दिव्य माधुर्य का अत्यंत मार्मिक वर्णन मिलता है।

रसिक आचार्य कहते हैं कि इन पदों का वास्तविक रस केवल पढ़ने से नहीं, बल्कि भावपूर्वक मनन और रसिक संतों के सान्निध्य से प्रकट होता है।

क्यों विशेष माना जाता है यह प्रथम पद?

रसिक परंपरा में एक सुंदर मान्यता प्रचलित है कि यह पद स्वयं श्री प्रिया जी के मुखारविंद से प्रकट हुआ है।

यहाँ श्री राधा अपनी सखी से श्री श्यामसुन्दर के प्रति अपने निष्कलुष प्रेम का वर्णन करती हैं। इस पद में कहीं भी अपने सुख की कामना नहीं है। प्रत्येक पंक्ति केवल यह कहती है कि—

“जो मेरे प्रिय को अच्छा लगे, वही मुझे भी प्रिय है।”

यही प्रेममार्ग का सर्वोच्च आदर्श है।

हित चौरासी का प्रथम पद

जोई जोई प्यारे करे सोई मोहि भावे।
भावे मोहि जोई सोई सोई करे प्यारे॥
मोको तो भावती ठौर प्यारे के नैनन में।
प्यारे भए चाहे मेरे नैनन के तारे॥
मेरे तन मन प्राण ह्वै प्रीतम प्रिय।
अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसो हारे॥
जय श्रीहित हरिवंश हंस हंसिनी साँवल गौर।
कहो कौन करे जल तरंगिनी न्यारे॥

पद की प्रत्येक पंक्ति का सरल अर्थ

“जोई जोई प्यारे करे सोई मोहि भावे”

सरल अर्थ

मेरे प्रियतम श्री श्यामसुन्दर जो भी करते हैं, वही मुझे अच्छा लगता है।

भावार्थ

यह प्रेम की पहली सीढ़ी नहीं, बल्कि अंतिम अवस्था है। सामान्य प्रेम में हम चाहते हैं कि सामने वाला हमारी इच्छा पूरी करे। लेकिन यहाँ श्री राधा कहती हैं—

“मेरी कोई अलग इच्छा नहीं है। मेरे प्रिय जो करें वही मेरे लिए श्रेष्ठ है।”

यही निष्काम प्रेम है।

“भावे मोहि जोई सोई सोई करे प्यारे”

सरल अर्थ

और जो कुछ मुझे प्रिय लगता है, वही मेरे प्रियतम भी करते हैं।

भावार्थ

यहाँ प्रेम की अद्भुत समानता दिखाई देती है।

श्री राधा और श्रीकृष्ण दो शरीर अवश्य हैं, पर उनकी इच्छा अलग नहीं है। दोनों के हृदय एक ही भाव से स्पंदित होते हैं।

रसिक आचार्य कहते हैं कि प्रेम की परिपक्व अवस्था में दो व्यक्तियों की इच्छाएँ नहीं रहतीं; वहाँ केवल प्रेम की एक धारा बहती है।

“मोको तो भावती ठौर प्यारे के नैनन में”

सरल अर्थ

मुझे तो सबसे प्रिय स्थान मेरे प्रियतम के नेत्रों में है।

भावार्थ

यहाँ “नयन” केवल आँखें नहीं हैं।

ब्रज साहित्य में नेत्रों का अर्थ है—हृदय का सबसे अंतरंग स्थान।

श्री प्रिया जी कहती हैं—

“यदि मुझे कहीं निवास करना हो, तो मैं किसी महल, वन या निकुंज में नहीं रहना चाहती। मेरा सबसे प्रिय स्थान तो मेरे श्यामसुन्दर की आँखों में है।”

यह कितना अद्भुत प्रेम है! जहाँ रहने की इच्छा भी किसी स्थान की नहीं, बल्कि प्रिय की दृष्टि में बस जाने की है।

“प्यारे भए चाहे मेरे नैनन के तारे”

सरल अर्थ

यदि मेरे प्रिय चाहें, तो वे मेरे नेत्रों के तारे बन जाएँ।

भावार्थ

जैसे आँख अपनी पुतली की सबसे अधिक रक्षा करती है, वैसे ही श्री राधा अपने प्रियतम को अपने नेत्रों में बसाकर सदा देखना चाहती हैं।

लेकिन यहाँ भी ध्यान देने योग्य बात है कि श्री प्रिया जी कोई आग्रह नहीं करतीं। वे कहती हैं—

“यदि प्रिय चाहें…”

यानी प्रेम में आदेश नहीं, केवल विनम्र इच्छा होती है।

इस पद के आरंभ में ही प्रेममार्ग का सम्पूर्ण दर्शन

इन चार पंक्तियों में ही श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने प्रेममार्ग का मूल सिद्धांत रख दिया है।

  • प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं, समर्पण है।
  • प्रेम का अर्थ अपनी इच्छा का त्याग है।
  • प्रेम का अर्थ प्रिय की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता खोजना है।
  • प्रेम का अर्थ यह नहीं कि मैं प्रिय को बदल दूँ, बल्कि स्वयं को प्रिय के अनुरूप ढाल दूँ।

यही कारण है कि रसिक संत इस पद को प्रेममार्ग का प्रथम सोपान मानते हैं।

आज के जीवन में इस पद की प्रासंगिकता

यदि हम इस पद को केवल श्री राधा-कृष्ण की लीला तक सीमित कर दें, तो इसके व्यावहारिक संदेश का एक बड़ा भाग छूट जाएगा।

आज अधिकांश रिश्ते इसलिए टूटते हैं क्योंकि दोनों पक्ष चाहते हैं कि दूसरा उनकी इच्छा के अनुसार चले। पति-पत्नी, मित्र, परिवार या समाज—हर जगह अपेक्षाएँ बढ़ती जाती हैं और प्रेम घटता जाता है।

श्री प्रिया जी का यह पद हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम अधिकार से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की प्रसन्नता को अपना सुख मानने से पुष्ट होता है। यद्यपि सांसारिक संबंधों में स्वस्थ सीमाएँ और पारस्परिक सम्मान भी आवश्यक हैं, फिर भी यह पद हमें अहंकार से ऊपर उठकर प्रेम के निस्वार्थ स्वरूप की ओर देखने की प्रेरणा देता है।

हित चौरासी के प्रथम पद की इन प्रारम्भिक पंक्तियों में ही श्री राधा ने प्रेम का ऐसा स्वरूप प्रकट किया है, जिसमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ का कोई स्थान नहीं बचता। यहाँ प्रेम अधिकार नहीं माँगता, प्रतिदान की अपेक्षा नहीं करता और स्वयं को सिद्ध करने का प्रयास भी नहीं करता। वह तो केवल प्रिय की प्रसन्नता में अपना सम्पूर्ण अस्तित्व विलीन कर देता है।

किन्तु इस पद का रहस्य यहीं समाप्त नहीं होता। आगे श्री प्रिया जी कहती हैं—“मेरे तन मन प्राण ह्वै प्रीतम प्रिय…” और फिर “अपने कोटिक प्राण…” जैसी पंक्तियों में प्रेम की ऐसी गहराई प्रकट होती है, जिसे रसिक आचार्यों ने माधुर्य रस का परम शिखर कहा है।

रसिक आचार्यों का कहना है कि इस स्थान पर पहुँचकर प्रेमी और प्रिय के बीच का भेद धीरे-धीरे विलीन होने लगता है। यही कारण है कि आगे की प्रत्येक पंक्ति में प्रेम का ऐसा रहस्य छिपा है, जिसे सामान्य बुद्धि से नहीं, बल्कि भाव से ही समझा जा सकता है। चलिए आगे चलते हैं-

“मेरे तन मन प्राण ह्वै प्रीतम प्रिय” — प्रेम का सम्पूर्ण समर्पण

मेरे तन मन प्राण ह्वै प्रीतम प्रिय।

सरल अर्थ

मेरे प्रियतम मेरे तन, मन और प्राण से भी अधिक प्रिय हैं।

गूढ़ भावार्थ

यहाँ श्री प्रिया जी केवल यह नहीं कह रहीं कि उन्हें श्रीकृष्ण प्रिय हैं। वह कह रही हैं कि अब उनके जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं बचा जो श्रीकृष्ण से अलग हो।

मनुष्य के लिए सबसे प्रिय तीन ही वस्तुएँ मानी जाती हैं—तन, मन और प्राण।

  • तन से वह संसार में कर्म करता है।
  • मन से वह प्रेम, स्मृति और अनुभूति करता है।
  • प्राण से उसका अस्तित्व बना रहता है।

किन्तु श्री राधा कहती हैं कि यदि इन तीनों की तुलना भी मेरे प्रियतम से की जाए तो ये तीनों भी तुच्छ हैं।

यही प्रेममार्ग की सबसे बड़ी विशेषता है। यहाँ भगवान केवल पूजे नहीं जाते, बल्कि जीए जाते हैं। भक्त का प्रत्येक श्वास, प्रत्येक विचार और प्रत्येक धड़कन प्रिय के नाम पर समर्पित हो जाती है।

रसिक संत कहते हैं कि जब तक साधक अपने सुख, अपने सम्मान, अपनी इच्छाओं और अपने अस्तित्व को सबसे ऊपर रखता है, तब तक प्रेम की यात्रा प्रारम्भ ही नहीं होती। प्रेम वहीं प्रारम्भ होता है जहाँ “मैं” पीछे हट जाता है और “प्रिय” आगे आ जाते हैं।

‘तन’ का रहस्य क्या है?

सामान्य अर्थ में तन शरीर है, लेकिन इस पद में तन का अर्थ केवल देह नहीं है।

यह उस सम्पूर्ण सेवा का प्रतीक है, जो प्रिय के लिए की जाती है।

ब्रज की गोपियाँ अपने शरीर को अपना नहीं मानतीं। उनके लिए यह शरीर केवल इसलिए है कि इससे श्रीकृष्ण की सेवा हो सके।

इसलिए प्रेममार्ग में शरीर भोग का साधन नहीं, बल्कि सेवा का उपकरण बन जाता है।

‘मन’ का रहस्य क्या है?

मन चंचल होता है। वह प्रत्येक क्षण कहीं न कहीं दौड़ता रहता है।

किन्तु श्री प्रिया जी का मन कहीं भटकता नहीं।

उनका मन जहाँ जाता है, वहाँ केवल श्रीश्यामसुन्दर ही दिखाई देते हैं।

इसीलिए रसिक संत कहते हैं—

जिस मन में संसार के लिए स्थान कम होता जाता है, उसी मन में ब्रज का माधुर्य प्रकट होने लगता है।

जरूर पढ़ें- मनोविज्ञान में मन क्या है?

‘प्राण’ का रहस्य

प्राण का अर्थ केवल साँस नहीं है।

प्राण जीवन की चेतना है।

यदि कोई मनुष्य अपना धन खो दे, तो भी जी सकता है।

यदि सम्मान चला जाए, तब भी जीवन चलता रहता है।

किन्तु यदि प्राण चले जाएँ तो शरीर निष्प्राण हो जाता है।

श्री प्रिया जी कहती हैं—

“मेरे लिए मेरे प्राण भी प्रियतम से छोटे हैं।”

यानी यदि प्रेम और प्राण में से किसी एक को चुनना पड़े, तो वह प्राणों का त्याग कर देंगी, लेकिन प्रेम का नहीं।

यही कारण है कि ब्रज के प्रेम को संसार का सर्वोच्च प्रेम कहा गया है।

जरूर पढ़ें- प्राण की गति कैसे कम करें?

“अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसो हारे” — प्रेम में श्रीकृष्ण भी हार जाते हैं

अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसो हारे।

सरल अर्थ

मेरे प्रियतम तो अपने करोड़ों प्राण भी मुझ पर न्योछावर कर चुके हैं।

यह पंक्ति इतनी अद्भुत क्यों है?

पहली दृष्टि में ऐसा लगता है कि यहाँ श्री राधा अपनी महिमा बता रही हैं।

लेकिन वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है।

रसिक आचार्य कहते हैं कि यह श्रीकृष्ण की महिमा का वर्णन है।

श्री राधा कह रही हैं—

“मैं उन्हें अपने तन, मन और प्राण से अधिक प्रिय मानती हूँ, पर मेरे श्यामसुन्दर तो मुझ पर अपने असंख्य प्राण न्योछावर कर चुके हैं।”

यहाँ प्रेम प्रतियोगिता नहीं बनता।

यहाँ दोनों एक-दूसरे पर प्रेम लुटाने में स्वयं को हारते रहते हैं।

इसीलिए प्रेममार्ग में हारना ही सबसे बड़ी जीत माना गया है।

‘कोटिक प्राण’ का रहस्य

यहाँ ‘कोटिक’ संख्या नहीं है।

यह अनन्तता का प्रतीक है।

भगवान अनन्त हैं।

उनकी करुणा अनन्त है।

उनका प्रेम अनन्त है।

इसलिए श्री प्रिया जी कहती हैं कि मेरे प्रिय का प्रेम किसी सीमा में नहीं बँध सकता।

वह असीम है।

प्रेममार्ग में ‘हारना’ ही क्यों विजय है?

संसार कहता है—

“जो जीत गया वही श्रेष्ठ।”

ब्रज कहता है—

“जो प्रेम में हार गया, वही सबसे बड़ा विजेता है।”

क्योंकि प्रेम किसी को पराजित करने का नाम नहीं है।

प्रेम तो स्वयं को समर्पित करने का नाम है।

इसीलिए श्रीकृष्ण स्वयं गीता में कहते हैं कि वे भक्त के प्रेम से बँध जाते हैं।

ब्रज में भगवान अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि प्रेम से पहचाने जाते हैं।

“जय श्रीहित हरिवंश हंस हंसिनी साँवल गौर” — हंस और हंसिनी का अद्भुत रहस्य

जय श्रीहित हरिवंश हंस हंसिनी साँवल गौर।

सरल अर्थ

हे श्री हित हरिवंश! श्रीश्यामसुन्दर और श्रीराधा हंस और हंसिनी के समान शोभायमान हैं—एक श्यामल हैं, दूसरी गौरवर्णा।

हंस का प्रतीक क्यों?

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में हंस केवल एक पक्षी नहीं है।

वह विवेक, निर्मलता और प्रेम का प्रतीक माना गया है।

हंस सदैव अपने साथी के साथ रहता है।

उसकी गति शांत होती है।

उसका सौन्दर्य सहज होता है।

इसीलिए रसिक कवियों ने श्रीराधा और श्रीकृष्ण की युगल छवि की तुलना हंस और हंसिनी से की है।

‘साँवल’ और ‘गौर’ का रहस्य

एक ओर श्यामसुन्दर का मेघश्याम स्वरूप।

दूसरी ओर श्रीराधा की गौर कांति।

दोनों के रंग अलग हैं, पर प्रेम एक है।

यही प्रेम की सबसे सुंदर शिक्षा है।

समानता रंगों की नहीं, हृदय की होती है।

कहो कौन करे जल तरंगिनी न्यारे” — जल और तरंग का दिव्य रहस्य

कहो कौन करे जल तरंगिनी न्यारे।

सरल अर्थ

बताओ, जल और उसकी तरंगों को कौन अलग कर सकता है?

गूढ़ भावार्थ

यही इस पूरे पद का शिखर है।

श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने अंत में ऐसा उदाहरण दिया है जिसे पढ़कर सम्पूर्ण पद का अर्थ स्वयं स्पष्ट हो जाता है।

जब किसी सरोवर में तरंग उठती है, तो क्या वह जल से अलग होती है?

नहीं।

वह जल ही है।

उसका नाम केवल तरंग है।

उसी प्रकार श्रीराधा और श्रीकृष्ण दो दिखाई अवश्य देते हैं, किन्तु उनका प्रेम, उनका अस्तित्व और उनका आनन्द एक ही है।

रसिक संत कहते हैं कि यदि कोई जल और तरंग को अलग कर सकता है, तभी वह राधा और कृष्ण को अलग मान सकता है।

अन्यथा दोनों एक-दूसरे के बिना पूर्ण नहीं हैं।

प्रेममार्ग में इस उपमा का महत्व

यह उपमा केवल दर्शन नहीं है।

यह साधना है।

जब साधक बार-बार इस भाव का चिंतन करता है कि राधा और कृष्ण अभिन्न हैं, तब उसके भीतर भी द्वैत धीरे-धीरे कम होने लगता है।

वह भगवान को बाहर खोजने के बजाय प्रेम के भीतर अनुभव करने लगता है।

यही कारण है कि रसिक संत इस पद का केवल पाठ नहीं करते, बल्कि उसका चिंतन करते हैं।

क्या यह केवल काव्य है?

यदि कोई इस पद को केवल साहित्य समझकर पढ़ेगा, तो उसे इसमें सुंदर शब्द दिखाई देंगे।

यदि कोई इसे भक्ति का गीत समझेगा, तो उसे इसमें प्रेम दिखाई देगा।

किन्तु यदि कोई रसिक संतों की परंपरा में प्रवेश करके इसे पढ़ेगा, तो उसे अनुभव होगा कि यह पद वास्तव में निकुंज प्रेम का साक्षात् दर्शन है।

यही कारण है कि सदियों से रसिक भक्त इस एक पद का बार-बार मनन करते हैं और प्रत्येक बार उन्हें इसमें नया अर्थ, नया रस और नई अनुभूति प्राप्त होती है। शब्द वही रहते हैं, पर साधक का हृदय बदलता जाता है।

अब तक हमने देखा कि श्री प्रिया जी का प्रेम केवल भावुकता नहीं, बल्कि पूर्ण आत्म-समर्पण है। उनके लिए तन, मन, प्राण, अस्तित्व, सम्मान—सब कुछ प्रियतम में समाहित हो चुका है। दूसरी ओर श्रीश्यामसुन्दर भी अपने अनंत प्रेम से श्री प्रिया जी पर स्वयं को न्योछावर कर देते हैं। यही कारण है कि इस पद का अंत जल और तरंग की उस अनुपम उपमा पर होता है, जहाँ दो रूप दिखाई देते हैं, किन्तु सत्ता एक ही रहती है।

किन्तु इस पद का संदेश केवल निकुंज-लीला का वर्णन भर नहीं है। प्रश्न यह है कि आज का साधक इस पद से क्या सीखे? क्या यह केवल रसिक संतों के लिए है, या सामान्य भक्त भी इसके माध्यम से अपने जीवन और साधना को दिशा दे सकता है? प्रेममार्ग में इस पद का वास्तविक स्थान क्या है, और श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने इसे अपनी वाणी के आरम्भ में ही क्यों रखा?

हित चौरासी के प्रथम पद से साधक क्या सीखे? प्रेममार्ग की साधना, जीवन संदेश और श्री हित हरिवंश महाप्रभु का दिव्य दर्शन

पिछले दो भागों में हमने देखा कि श्री प्रिया जी का प्रेम अधिकार का नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण का प्रेम है। उन्होंने अपने प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर के प्रति ऐसा निष्काम प्रेम व्यक्त किया है, जहाँ अपनी इच्छा, अपना सुख, अपना अस्तित्व—सब कुछ प्रिय की प्रसन्नता में विलीन हो जाता है। अंत में जल और तरंग की उपमा देकर श्री हित हरिवंश महाप्रभु यह स्पष्ट कर देते हैं कि श्री राधा और श्रीकृष्ण को अलग-अलग समझना संभव ही नहीं है।

अब प्रश्न यह है कि इस पद का हमारी साधना से क्या संबंध है? क्या यह केवल नित्य निकुंज की लीला का काव्य है, या इसके भीतर प्रत्येक साधक के लिए भी कोई मार्गदर्शन छिपा है? वास्तव में यही इस पद का सबसे बड़ा रहस्य है।

प्रेममार्ग में इस पद का स्थान इतना ऊँचा क्यों माना जाता है?

रसिक आचार्य कहते हैं कि हित चौरासी का प्रथम पद ही सम्पूर्ण प्रेममार्ग का द्वार है। यदि कोई साधक इस एक पद के भाव को अपने हृदय में उतार ले, तो उसके लिए शेष चौरासी पदों का रस समझना सरल हो जाता है।

इसका कारण यह है कि प्रेममार्ग की पूरी साधना एक ही सूत्र पर आधारित है—

“प्रिय की प्रसन्नता ही मेरी प्रसन्नता है।”

जब तक साधक भगवान से अपनी इच्छाएँ पूरी कराने की अपेक्षा रखता है, तब तक वह भक्त अवश्य है, पर प्रेमी नहीं। प्रेम की शुरुआत वहीं होती है जहाँ मनुष्य यह कहना सीख जाता है—

“प्रभु! मुझे वह नहीं चाहिए जो मुझे अच्छा लगता है, मुझे वही चाहिए जो आपको प्रिय है।”

श्री प्रिया जी ने अपने इस पद में इसी प्रेम की पराकाष्ठा का दर्शन कराया है।

क्या यह पद केवल श्री राधा-कृष्ण की लीला का वर्णन है?

पहली दृष्टि में ऐसा लगता है कि यह केवल श्री राधा और श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम का वर्णन है। किन्तु रसिक संत कहते हैं कि यह पद साधक के लिए भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।

इस पद का उद्देश्य केवल लीला का वर्णन करना नहीं है, बल्कि साधक के भीतर प्रेम का संस्कार जगाना है।

जब कोई साधक बार-बार इस पद का मनन करता है, तब धीरे-धीरे उसके भीतर भी परिवर्तन होने लगता है। पहले वह भगवान से माँगता है, फिर भगवान की इच्छा स्वीकार करना सीखता है और अंततः भगवान की प्रसन्नता में ही अपना सुख खोजने लगता है।

यही प्रेममार्ग की वास्तविक यात्रा है।

प्रेममार्ग में ‘मैं’ का स्थान कहाँ है?

यह पद बार-बार एक ही शिक्षा देता है कि प्रेम में ‘मैं’ जितना छोटा होता जाता है, ‘प्रिय’ उतने बड़े होते जाते हैं।

संसार का प्रेम अक्सर ‘मैं’ से शुरू होता है—

  • मुझे सम्मान मिले।
  • मेरी बात मानी जाए।
  • मेरी इच्छा पूरी हो।
  • मुझे सुख मिले।

किन्तु ब्रज का प्रेम ‘प्रिय’ से आरम्भ होता है—

  • प्रिय क्या चाहते हैं?
  • प्रिय किसमें प्रसन्न होंगे?
  • प्रिय को क्या अच्छा लगेगा?

यही कारण है कि रसिक संत अहंकार को प्रेम का सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं।

साधना में इस पद का चिंतन कैसे करें?

यह पद केवल गाने या पढ़ने के लिए नहीं है। रसिक परंपरा में इसका भावपूर्वक चिंतन किया जाता है।

साधक जब इस पद का पाठ करे, तब केवल शब्दों का उच्चारण न करे, बल्कि प्रत्येक पंक्ति को अपने जीवन से जोड़ने का प्रयास करे।

चिंतन के कुछ सरल भाव

  • क्या मैं भगवान से अधिक अपनी इच्छाओं को महत्व देता हूँ?
  • क्या मैं विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी इच्छा स्वीकार कर पाता हूँ?
  • क्या मेरी भक्ति केवल माँगने तक सीमित है?
  • क्या मैं भगवान को प्रसन्न करने के लिए कुछ करता हूँ?

ऐसे प्रश्न साधक के भीतर आत्मचिंतन उत्पन्न करते हैं और यही इस पद की साधना का प्रारम्भ है।

जल और तरंग की उपमा आज भी क्यों प्रासंगिक है?

आज का मनुष्य स्वयं को संसार से अलग मानता है। वह अपने सुख-दुःख, सफलता-असफलता और अहंकार में उलझा रहता है।

किन्तु जल और तरंग का उदाहरण हमें याद दिलाता है कि अलग दिखाई देना और वास्तव में अलग होना, दोनों एक बात नहीं हैं।

जैसे तरंग जल से अलग नहीं होती, वैसे ही जीव भी परमात्मा से पूर्णतः पृथक नहीं है। भक्ति का उद्देश्य इसी विस्मृत संबंध को पुनः जागृत करना है।

श्री राधा और श्रीकृष्ण की अभिन्नता केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं, बल्कि प्रेम का चरम अनुभव है।

हित चौरासी का यह प्रथम पद आज के समाज को क्या सिखाता है?

आज संबंधों में प्रेम कम और अपेक्षाएँ अधिक दिखाई देती हैं। पति-पत्नी, माता-पिता, मित्र या भाई-बहन—अधिकांश विवादों का कारण यही होता है कि प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि दूसरा उसकी इच्छा के अनुसार चले।

ऐसे समय में श्री प्रिया जी का यह पद हमें एक अलग दृष्टि देता है।

यह हमें सिखाता है कि संबंध केवल अधिकार से नहीं चलते, बल्कि परस्पर सम्मान, समर्पण और दूसरे के सुख का ध्यान रखने से मधुर बनते हैं। ध्यान रहे कि इसका अर्थ अन्याय, शोषण या आत्मसम्मान का त्याग नहीं है। सांसारिक जीवन में स्वस्थ सीमाएँ, संवाद और पारस्परिक सम्मान भी उतने ही आवश्यक हैं। परन्तु यह पद हमें यह अवश्य सिखाता है कि प्रेम का मूल स्वभाव स्वार्थ नहीं, उदारता है।

श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने इसी पद से आरम्भ क्यों किया?

यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यदि श्री हित हरिवंश महाप्रभु चाहते, तो वे श्री राधा-कृष्ण के रूप, सौंदर्य, निकुंज या रासलीला से भी अपनी वाणी का प्रारम्भ कर सकते थे।

किन्तु उन्होंने सबसे पहले प्रेम का सिद्धांत बताया।

क्यों?

क्योंकि बिना प्रेम के लीला केवल कथा बन जाती है।

बिना समर्पण के भक्ति केवल कर्मकाण्ड बन जाती है।

बिना निष्काम भाव के भगवान केवल पूजा की मूर्ति बनकर रह जाते हैं।

इसीलिए उन्होंने आरम्भ में ही बता दिया कि यदि प्रेम समझना है, तो पहले अपने भीतर के ‘मैं’ को छोटा करना होगा।

रसिक संत इस पद का बार-बार स्मरण क्यों करते हैं?

कहा जाता है कि रसिक महापुरुष एक ही पद का वर्षों तक चिंतन करते रहते हैं।

इसका कारण यह है कि दिव्य प्रेम के पदों का अर्थ केवल शब्दों से नहीं खुलता।

जैसे-जैसे साधक का हृदय निर्मल होता है, वैसे-वैसे उसी पद में नए-नए अर्थ प्रकट होने लगते हैं।

आज जो पंक्ति केवल कविता लगती है, वही कल साधना बन जाती है और एक दिन वही अनुभूति का द्वार खोल देती है।

इसीलिए हित चौरासी को केवल पढ़ा नहीं जाता, जिया जाता है।

निष्कर्ष

“जोई जोई प्यारे करे सोई मोहि भावे…” यह केवल आठ पंक्तियों का पद नहीं है, बल्कि प्रेम का संपूर्ण दर्शन है।

इसमें श्री प्रिया जी ने अपने हृदय का वह रहस्य प्रकट किया है, जहाँ प्रेम अधिकार से ऊपर उठकर समर्पण बन जाता है, अपेक्षा से ऊपर उठकर आनंद बन जाता है और द्वैत से ऊपर उठकर एकत्व का अनुभव बन जाता है।

श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने इस पद को हित चौरासी के आरम्भ में रखकर मानो सम्पूर्ण प्रेममार्ग का सार एक ही स्थान पर रख दिया है। जो साधक इस पद के भाव को समझने और अपने जीवन में उतारने का प्रयास करता है, उसके लिए भक्ति केवल पूजा नहीं रहती, बल्कि जीवन का स्वभाव बन जाती है।

यही इस पद की सबसे बड़ी महिमा है और यही इसका शाश्वत संदेश भी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

हित चौरासी क्या है?

हित चौरासी श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा रचित 84 पदों का दिव्य संग्रह है, जिसमें श्री राधा-कृष्ण के माधुर्य रस और प्रेममार्ग का वर्णन मिलता है।

हित चौरासी के प्रथम पद का वक्ता कौन है?

रसिक परंपरा में माना जाता है कि यह पद स्वयं श्री प्रिया जी (श्री राधा रानी) के श्रीमुख से उनकी अंतरंग सखी के प्रति कहा गया है।

क्या यह सच है कि यही एकमात्र पद श्री प्रिया जी का है?

राधावल्लभ रसिक परंपरा में ऐसी मान्यता प्रचलित है कि हित चौरासी में यही एक पद श्री प्रिया जी के प्रत्यक्ष वचनों के रूप में माना जाता है। शेष पदों में मुख्यतः सखी, रसिक भाव या श्री हित हरिवंश महाप्रभु की अनुभूति प्रकट होती है।

“जोई जोई प्यारे करे सोई मोहि भावे” का मुख्य संदेश क्या है?

इसका मुख्य संदेश है कि सच्चे प्रेम में प्रिय की इच्छा ही अपनी इच्छा बन जाती है और प्रिय की प्रसन्नता ही अपना सुख होती है।

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