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Radha-Krishna-Pad: हमारे माई श्यामा जू की राज – श्री विदुल विपुल देव जी की वाणी का भावार्थ

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हमारे माई श्यामा जू की राज का मूल पद (राग मल्हार)

हमारे माई श्यामा जू की राज ।
जाके अधीन सदाई साँवरी या ब्रज की सिरताज ॥
यह जोरी अविचल वृन्दावन नाहिं आन सो काज ।
श्री विदुल विपुल बिहारिनि के बल दिन जलधर ज्यों गाज ॥

हमारे माई श्यामा जू की राज का अर्थ : हमारी माई (सखी) श्री श्यामा जू का ही नित्य राज है। रसिक सिरमौर, ब्रज राज श्री कृष्ण भी हमेशा जिनके आधीन रहते हैं वह श्री राधा ही हैं। श्री राधा कृष्ण की यह दिव्य जोरी नित्य ही वृन्दावन में विहार करती है, ऐसा लगता है मानो इनको और किसी काम से मतलब नहीं है, अर्थात अपनी सखियों को दिव्य रस देने के लिए ही यह नित्य विहार करती हैं। श्री विदुल विपुल देव जी के शब्दों में एक मात्र बिहारिनि श्री राधारानी के बल पर ही उनको नित्य विहार रस प्राप्त होता है।

आप इसको पूज्य प्रेमानंद जी महाराज (Shri Hit Premanand ji maharaj) की वाणी में भी सुन सकते हैं

‘हमारे माई श्यामा जू की राज’ का विस्तृत भावार्थ

श्री विदुल विपुल देव जी महाराज की वाणी में रचित “हमारे माई श्यामा जू की राज” पद दिव्य प्रेम और भक्ति का अद्भुत घोष है। इस पद में कवि अत्यंत स्नेह और आत्मीयता से कहते हैं कि ब्रज में यदि किसी का नित्य और वास्तविक राज्य है, तो वह हमारी माई श्री श्यामा जू अर्थात् श्री राधारानी का है।

वे केवल ब्रज की अधीश्वरी ही नहीं, बल्कि प्रेम की परम सत्ता हैं। ब्रज के सिरमौर, रसिक-शिरोमणि श्री कृष्ण भी सदा उनके अधीन रहते हैं। यह अधीनता किसी बंधन का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रेम की पराकाष्ठा का द्योतक है — जहाँ स्वयं सर्वशक्तिमान भी प्रेम के आगे नतमस्तक हो जाते हैं।

राधा और कृष्ण की यह अविचल, अनंत और दिव्य जोड़ी सदा वृन्दावन में नित्य विहार करती है। उनका यह विहार किसी सांसारिक प्रयोजन या लोक व्यवहार के लिए नहीं है।

ऐसा प्रतीत होता है मानो उन्हें किसी अन्य कार्य से कोई सरोकार ही नहीं; वे तो केवल अपने प्रिय सखियों और भक्तों को दिव्य प्रेम-रस का आस्वादन कराने के लिए ही यह नित्य लीला रचती हैं। वृन्दावन की प्रत्येक कुंज, प्रत्येक लता और प्रत्येक समीर उनके इस प्रेम-विहार की साक्षी है।

श्री विदुल विपुल देव जी आगे कहते हैं कि यह समस्त लीला और नित्य रस-वर्षा श्री राधारानी की कृपा और शक्ति से ही संभव है। जिस प्रकार मेघ आकाश में गर्जना करते हुए जीवनदायिनी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार श्री राधा के बल से ही प्रेम का अमृत निरंतर बरसता रहता है।

श्री कृष्ण का नित्य विहार-रस भी श्री राधारानी के प्रभाव और सामर्थ्य से ही संपन्न होता है। इस प्रकार यह पद केवल एक काव्य रचना नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम के सर्वोच्च सिद्धांत का उद्घोष है — जहाँ प्रेम ही वास्तविक राज्य है, और उसी प्रेम के अधीन ब्रज, वृन्दावन तथा स्वयं ब्रजराज श्री कृष्ण भी स्थित हैं।

भक्ति दृष्टि से भावार्थ

इस पद में कवि श्री विदुल विपुल देव जी महाराज कहते हैं कि हमारी सच्ची स्वामिनी, हमारी आराध्या श्री श्यामा जी (राधारानी) का ही ब्रज में नित्य राज्य है।

श्री कृष्ण स्वयं ब्रज के सिरताज माने जाते हैं, परंतु वे भी सदा श्री राधा के अधीन रहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि यह सांसारिक अधीनता है, बल्कि यह प्रेम की पराकाष्ठा है — जहाँ भगवान भी प्रेम के बंधन में बंध जाते हैं।

राधा-कृष्ण की यह दिव्य जोड़ी वृन्दावन में सदा विहार करती है। उनका उद्देश्य कोई सांसारिक कार्य नहीं है; वे तो केवल अपने सखियों और भक्तों को दिव्य प्रेम-रस प्रदान करने के लिए ही नित्य विहार करते हैं।

अंतिम पंक्ति में कवि कहते हैं कि यह सब श्री राधा जी की शक्ति से ही संभव है। जिस प्रकार बादल प्रतिदिन गरजते हैं, उसी प्रकार श्री राधारानी की कृपा से प्रेम का रस निरंतर प्रकट होता रहता है।

प्रेम दृष्टि से भावार्थ

अगर इसे प्रेम की दृष्टि से देखें, तो यहाँ एक अत्यंत गूढ़ संदेश छिपा है —

प्रेम में अधिकार नहीं, समर्पण होता है।
कृष्ण सर्वशक्तिमान होते हुए भी राधा के प्रेम के सामने नतमस्तक हैं।

यह हमें सिखाता है कि जहाँ सच्चा प्रेम होता है, वहाँ अहंकार नहीं रहता।
राधा का “राज” वास्तव में प्रेम का राज है — जहाँ शक्ति नहीं, भावना शासन करती है।

वृन्दावन केवल एक स्थान नहीं, बल्कि वह अवस्था है जहाँ हृदय में राधा-कृष्ण का प्रेम बस जाए।

आध्यात्मिक संदेश

  • ईश्वर भी प्रेम के अधीन हो जाते हैं।
  • सच्चा भक्त वही है जो राधा की शरण में जाए।
  • प्रेम ही ब्रह्म का सर्वोच्च रूप है।

“हमारे माई श्यामा जू की राज” केवल एक पद नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम का दर्शन है।

श्री विदुल विपुल देव जी महाराज ने इस वाणी में यह स्पष्ट किया है कि ब्रज में और भक्त के हृदय में यदि कोई राज्य करता है, तो वह श्री राधारानी का प्रेम है।

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FAQ – हमारे माई श्यामा जू की राज (श्री विदुल विपुल देव जी की वाणी)

1. “हमारे माई श्यामा जू की राज” का मुख्य भाव क्या है?

इस पद का मुख्य भाव यह है कि ब्रज में और भक्त के हृदय में श्री राधारानी का ही सर्वोच्च राज्य है। भगवान श्री कृष्ण भी प्रेमवश उनके अधीन रहते हैं। यह पद प्रेम की सर्वोच्चता और भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाता है।


2. इस पद के रचनाकार कौन हैं?

इस पद के रचनाकार श्री विदुल विपुल देव जी महाराज हैं। यह उनकी वाणी (27) का एक दिव्य पद है, जो राग मल्हार में रचा गया है।


3. “साँवरी या ब्रज की सिरताज” का क्या अर्थ है?

“साँवरी” शब्द से श्री कृष्ण का संकेत है, जिन्हें ब्रज का सिरताज (मुकुट, सर्वोच्च) कहा गया है। लेकिन इस पद में बताया गया है कि वे भी सदा श्री राधा जी के प्रेम के अधीन रहते हैं।


4. “यह जोरी अविचल वृन्दावन” का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है कि राधा-कृष्ण की दिव्य जोड़ी सदा वृन्दावन में स्थित और अटल है। उनका विहार नित्य है और किसी सांसारिक उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि प्रेम-रस प्रदान करने के लिए है।


5. इस पद में “जलधर ज्यों गाज” का क्या संकेत है?

जिस प्रकार बादल प्रतिदिन गरजते हैं, उसी प्रकार श्री राधारानी की कृपा से प्रेम का रस निरंतर प्रकट होता रहता है। यह उपमा प्रेम की शक्ति और निरंतरता को दर्शाती है।


6. इस पद से भक्तों को क्या संदेश मिलता है?

इस पद से यह संदेश मिलता है कि प्रेम ही ईश्वर को भी अपने अधीन कर लेता है। सच्ची भक्ति वही है जिसमें अहंकार नहीं, केवल समर्पण और शरणागति हो।


7. क्या यह पद केवल भक्ति पर आधारित है या प्रेम दर्शन भी है?

यह पद केवल भक्ति नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम दर्शन का भी अद्भुत उदाहरण है। इसमें राधा-कृष्ण के संबंध के माध्यम से प्रेम की सर्वोच्चता को दर्शाया गया है।


8. “हमारे माई” कहने का क्या विशेष अर्थ है?

“हमारे माई” शब्द अत्यंत स्नेहपूर्ण संबोधन है। इसमें भक्त का राधारानी से मातृत्व भाव से जुड़ाव व्यक्त होता है, जो भक्ति को और गहराई देता है।

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