श्री ध्रुवदास जी कौन थे?
राधा-प्रेम में डूबा एक विरल संत जीवन
Dhurv Das : वृन्दावन की पावन भूमि ने अनेक रसिक संतों को जन्म दिया है, पर उनमें श्री ध्रुवदास जी का स्थान अत्यंत विशेष है। वे केवल एक भक्त या कवि नहीं थे, बल्कि श्री राधारानी के विरह और प्रेम के साक्षात उदाहरण थे। उनका जीवन यह सिखाता है कि जब भक्ति दिखावे से नहीं, बल्कि हृदय की गहराई से निकलती है, तब ईश्वर स्वयं प्रकट हो जाते हैं।
श्री ध्रुवदास जी वृन्दावन की पावन भूमि से जुड़े एक महान रसिक संत, भक्त कवि और राधा-वल्लभ संप्रदाय के प्रमुख आचार्य थे। वे श्री हित हरिवंश महाप्रभु के तीसरे पुत्र श्री गोपीनाथ जी के शिष्य थे। उनका संपूर्ण जीवन श्री राधा-कृष्ण की माधुर्य भक्ति, विरह और प्रेम-रस में लीन रहा।
जन्म और बाल्यकाल
श्री ध्रुवदास जी का जन्म एक वैष्णव वातावरण में हुआ। बचपन से ही उनका मन सांसारिक विषयों में नहीं लगता था।
बाल अवस्था से ही उनके हृदय में —
- श्री राधा-कृष्ण के दर्शन की तीव्र लालसा
- विरह भाव की गहरी अनुभूति
- और भक्ति के प्रति अद्भुत आकर्षण
स्पष्ट दिखाई देता था।
वे अक्सर यमुना तट, वृन्दावन के कुंज-वन, और रास स्थली में भावावेश की अवस्था में विचरण करते थे।
हमारे संत कहते हैं कि भाई संतों में भगवान में मन लगाओं तो क्या केवल मन से चिंतन करने से ईश्वर को पाया जा सकता है? ये आपको जानना जरूरी है क्योंकि गलत रास्ते से हम मंजिल को नहीं पा सकते है उसके लिए सही मार्ग जरूरी है तो आज ही जाने –
क्या चिंतन के द्वारा ईश्वर को पाया जा सकता है?

गुरु परंपरा और साधना मार्ग
श्री ध्रुवदास जी ने राधा-वल्लभ संप्रदाय की परंपरा में दीक्षा ली। विरह ही उनकी साधना थी। ध्रुवदास जी की भक्ति का आधार विरह-भाव था। वे मानते थे कि प्रेम वह नहीं जो सुख दे, प्रेम वह है जो तड़पा दे।
इस परंपरा में —
- श्री राधा को सर्वोच्च माना जाता है
- श्री कृष्ण, राधा के प्रेम के अधीन माने जाते हैं
- भक्ति का मूल आधार माधुर्य और विरह है
उनकी साधना बाहरी आडंबर से दूर, अंतर की तड़प पर आधारित थी। कई-कई दिनों तक वे बिना भोजन और बिना निद्रा के, केवल राधा नाम का स्मरण करते रहते। उनका शरीर वृन्दावन में था, पर मन सदा राधारानी के चरणों में।
रास मंडल की दिव्य लीला
श्री ध्रुवदास जी के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना रास मंडल की लीला है। उनके जीवन की सबसे करुण और अलौकिक घटना रास मंडल से जुड़ी है। एक दिन वे रास मंडल पर आकर स्थिर हो गए और मन ही मन निश्चय किया— “जब तक राधारानी के दर्शन नहीं होंगे, मैं यहाँ से हटूँगा नहीं।” “यदि राधारानी के दर्शन नहीं हुए, तो इस जीवन का क्या प्रयोजन?”
वे कई दिनों तक
- बिना भोजन
- बिना निद्रा
- केवल राधा नाम का स्मरण करते रहे।
रात बीत गई, दिन निकल आया, फिर दूसरी रात भी गुजर गई।
शरीर थक चुका था, पर मन और अधिक जाग्रत हो गया था।
एक रात्रि, आधी जाग्रत और आधी स्वप्नावस्था में, उन्होंने मधुर पायल की ध्वनि सुनी और मस्तक पर प्रेमपूर्ण स्पर्श का अनुभव किया। जब आँखें खुलीं, तो सामने श्री राधारानी स्वयं खड़ी थीं। यह श्री राधारानी का साक्षात दर्शन था।
राधारानी ने कोमल स्वर में कहा— “मैं कभी तुमसे दूर नहीं जाऊँगी, मैं सदा तुम्हारे साथ रहूँगी।”
ध्रुवदास जी कुछ बोल न सके। आँखों से आँसू बहते रहे, यह प्रेम की पूर्णता का क्षण था।
राधारानी की कृपा के बाद जीवन परिवर्तन
इस दिव्य कृपा के बाद श्री ध्रुवदास जी का संपूर्ण व्यक्तित्व बदल गया। अब वे साधक नहीं,
बल्कि राधा-प्रेम का सजीव रूप बन चुके थे।
वे केवल साधक नहीं रहे, बल्कि — उनकी वाणी में रस था, उनकी दृष्टि में करुणा, और उनके शब्दों में केवल राधा।
- राधा-प्रेम के जीवंत स्वरूप
- विरह-रस के मूर्त उदाहरण
- और भक्ति के साक्षात प्रतीक बन गए।
श्री ध्रुवदास जी की साहित्यिक रचनाएँ
श्री ध्रुवदास जी एक महान भक्त-कवि भी थे। श्री ध्रुवदास जी ने अपने प्रेम को शब्दों में ढाल दिया। उनके साहित्य में —
- श्रृंगार रस – गूढ़ नहीं, बल्कि हृदय से निकला हुआ है
- माधुर्य भाव
- राधा की महिमा
- और विरह की पीड़ा
स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
प्रमुख साहित्यिक रचनाएँ
🔹 1. बयालीस लीला
- यह उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना है
- इसमें श्री राधा-कृष्ण की 42 दिव्य लीलाओं का वर्णन है
- राधा-वल्लभ संप्रदाय में यह ग्रंथ अत्यंत पूज्य माना जाता है
🔹 2. राधा-विरह पद
- इनमें विरह, तड़प और प्रेम की पराकाष्ठा दिखाई देती है
🔹 3. रसिक पदावली
- श्रृंगार और माधुर्य रस से भरपूर पद
राधावल्लभीय प्रेम का विशुद्ध स्वरूप
राधावल्लभीय सम्प्रदाय का उपासनीय विशुद्ध प्रेम, अतिशय उज्ज्वल एवं पूर्ण निष्काम है। इसकी प्रकृति और प्रताप विशुद्ध है। यह अह्निविहीन कौतुक और अनिर्वचनीय पदार्थ है। इसके उदय होने पर उपासक के हृदय में आनन्द की अनेक तरंगें उठती हैं और यह मन, प्राण, इन्द्रिय, आत्मा सब को सुखमय बना देता है।
पल-पल और और विधि, उपजत नाना रंग।
सब अंगनि को देत सुख, यह कौतुक बिनु अंग॥
(श्री ध्रुवदास)
श्री ध्रुवदास जी के मत से विशुद्ध प्रेम का स्वरूप, उज्ज्वलता (निष्कामता), निर्मलता विषय-वासनारहित, सरसता, स्निग्धता एवं मृदुता के संयोग से बनता है। इसमें माधुर्य और मादकता सदैव प्रकाशित रहते हैं। यह नित्य-नूतन रुचि से संयुक्त होकर अनुपम, सहज, स्वच्छन्द और सरस बना रहता है। विशुद्ध-प्रेम के उदय होने पर मन को सहज एकाग्रता प्राप्त हो जाती है। इस विशुद्ध प्रेम के वियोग रूपी दुःख की समता विश्व का कोई सुख नहीं कर सकता। तब इसके संयोग सुख की गति का वर्णन करने की सामर्थ्य किसमें है?
ह ऐसा प्रेम है जो:
- पूरी तरह निष्काम है (जिसमें कुछ पाने की चाह नहीं)
- अत्यंत पवित्र और उज्ज्वल है
- किसी सांसारिक इच्छा, कामना या स्वार्थ से रहित है
यह प्रेम केवल राधारानी को समर्पित होता है।
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि यह प्रेम शब्दों में पूरी तरह बताया नहीं जा सकता, तर्क से समझा नहीं जा सकता, अनुभव से ही जाना जा सकता है, जब यह प्रेम हृदय में जागता है, तो: मन, प्राण, इन्द्रियाँ और आत्मा सब आनंद से भर जाते हैं।
यह प्रेम हर क्षण नया-नया रूप लेता है, हर पल नया आनंद देता है। यह प्रेम बिना किसी भौतिक साधन के, पूरे शरीर और मन को सुख देता है। अर्थात यह प्रेम किसी वस्तु, रूप या क्रिया पर निर्भर नहीं है।
विशुद्ध प्रेम किन गुणों से बनता है?
श्री ध्रुवदास जी के अनुसार विशुद्ध प्रेम में ये गुण होते हैं:
- निष्कामता – कोई चाह नहीं
- निर्मलता – विषय-वासनाओं से रहित
- सरसता – रस से भरा हुआ
- स्निग्धता – कोमलता और अपनापन
- मृदुता – कठोरता का पूर्ण अभाव
इस प्रेम का प्रभाव क्या होता है?
जब यह प्रेम जागता है:
- मन अपने आप एकाग्र हो जाता है
- साधना बोझ नहीं रहती
- भक्ति सहज हो जाती है
- आनंद भीतर से बहने लगता है
वियोग और संयोग का रहस्य
ध्रुवदास जी कहते हैं:
- इस विशुद्ध प्रेम का वियोग (विरह) इतना गहरा होता है कि
संसार का कोई सुख उसकी बराबरी नहीं कर सकता - और जब संयोग (मिलन) होता है,
तो उसके आनंद का वर्णन करने की क्षमता किसी में नहीं होती
यानी वह आनंद अवर्णनीय है। राधावल्लभीय विशुद्ध प्रेम ऐसा प्रेम है जो न चाह रखता है, न शर्त;
वह केवल प्रेम के लिए प्रेम है — और वही सबसे ऊँचा आनंद है।
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श्री ध्रुवदास जी के प्रसिद्ध पद
पद 1
बिन राधा जीवन सूना लागे,
सांस-सांस में पीर जगावे।
यमुना तट कुंज गलिन में,
ध्रुवदास राधे नाम ध्यावे॥
पद 2
राधे राधे रटत रहूँ,
दिन रैन नयन बरसात।
एक झलक देहु करुणामयी,
कटे विरह की रात॥
पद 3
श्याम भी राधा चरणन बंधे,
राधा प्रेम महान।
ध्रुवदास कहे सुनो रसिक जन,
राधा ही भगवान॥
भक्ति दर्शन : श्री ध्रुवदास जी का भक्ति दर्शन कहता है — राधा के बिना कृष्ण की कल्पना अधूरी है, प्रेम में अधिकार नहीं, केवल समर्पण होता है, विरह ही सच्ची भक्ति को जन्म देता है, श्री ध्रुवदास जी का जीवन शब्दों से अधिक अनुभूति है।
वे आज भी वृन्दावन की गलियों, यमुना की लहरों और रसिक भक्तों के हृदय में जीवित हैं।
उनका नाम लेते ही राधा-प्रेम स्वयं बोल उठता है।

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