भारत में हर वर्ष लाखों-करोड़ों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं। कहीं रिकॉर्ड बनाने की बात होती है तो कहीं अभियान को जनआंदोलन का रूप देने की कोशिश। लेकिन आम नागरिक के मन में एक सवाल अक्सर उठता है—क्या ये पौधे वास्तव में बड़े होकर पेड़ बन पाते हैं या कुछ समय बाद सूख जाते हैं?
यही सवाल “एक पेड़ मां के नाम” अभियान को लेकर भी कई लोगों के मन में है।
रविवार को मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि “एक पेड़ मां के नाम” केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राणवायु का स्थायी प्रबंध करने का अभियान है। उन्होंने इसे जल, जंगल, जमीन और जैव विविधता की रक्षा से जोड़ते हुए समाज से व्यापक भागीदारी की अपील की।
मुख्यमंत्री ने क्या कहा?
इंदौर के ग्राम बुढ़ानिया स्थित बीएसएफ परिसर में मुख्यमंत्री ने अपनी माता स्वर्गीय श्रीमती लीला बाई यादव की स्मृति में संतरे का पौधा लगाया।
कार्यक्रम की प्रमुख घोषणाएं:
- इंदौर में 21 लाख पौधे लगाने का संकल्प।
- 51 हजार वर्षा जल संचयन इकाइयों के निर्माण का लक्ष्य।
- पौधरोपण और जल संरक्षण में सहयोग देने वाली संस्था “पृथ्वी” को 2 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि।
- नक्सल उन्मूलन अभियान में उल्लेखनीय योगदान देने वाले बीएसएफ के दो जवानों को 2-2 लाख रुपये सम्मान राशि देने की घोषणा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि पेड़ केवल पर्यावरण नहीं बचाते, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण कर मनुष्य को जीवनदायी प्राणवायु प्रदान करते हैं।
इंदौर क्यों बना इस अभियान का केंद्र?
मुख्यमंत्री ने देवी अहिल्याबाई होल्कर के समय बने कुओं और बावड़ियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जल संरक्षण हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रहा है।
इंदौर पहले ही स्वच्छता के क्षेत्र में देशभर में पहचान बना चुका है। अब शहर जल संरक्षण और बड़े पैमाने पर पौधरोपण को भी जनभागीदारी से जोड़ने का प्रयास कर रहा है।
महापौर पुष्यमित्र भार्गव के अनुसार:
- 51,000 रेन वाटर हार्वेस्टिंग यूनिट का लक्ष्य।
- अब तक लगभग 8,500 इकाइयों का निर्माण।
सबसे बड़ा सवाल: क्या लगाए गए पौधे वास्तव में पेड़ बनते हैं?
यही वह प्रश्न है जो हर जिम्मेदार नागरिक को पूछना चाहिए।
सच्चाई यह है कि भारत में कई सरकारी और निजी पौधरोपण अभियानों में लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन विभिन्न सरकारी ऑडिट, पर्यावरण विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्टों में कई बार यह सामने आया है कि सभी पौधे जीवित नहीं रह पाते।
इसके कई कारण हैं:
- पौधों को नियमित पानी नहीं मिलना।
- सुरक्षा के लिए ट्री गार्ड न लगाना।
- पशुओं द्वारा नुकसान।
- गलत मौसम में पौधरोपण।
- स्थानीय जलवायु के अनुरूप प्रजाति का चयन न होना।
- रोपण के बाद निगरानी का अभाव।
यानी पेड़ लगाने से अधिक महत्वपूर्ण है उनका जीवित रहना।
यदि 100 पौधे लगाए जाएं और केवल 20 ही जीवित रहें, तो वास्तविक सफलता 20% ही मानी जाएगी।
क्या सरकारें केवल फोटो खिंचवाती हैं?
जहां सफलता मिलती है
- कई राज्यों में सामुदायिक निगरानी के कारण पौधों का जीवित रहने का प्रतिशत काफी अच्छा रहता है।
- पंचायत, स्कूल, स्वयंसेवी संस्थाएं और स्थानीय नागरिक मिलकर देखभाल करते हैं।
- कुछ जिलों में GIS और GPS आधारित मॉनिटरिंग भी शुरू हुई है।
जहां कमियां दिखाई देती हैं
- कई जगह पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल नहीं होती।
- कुछ स्थानों पर केवल लक्ष्य पूरा करने पर अधिक ध्यान रहता है।
- सर्वाइवल ऑडिट नियमित नहीं होते।
इसलिए किसी भी अभियान की सफलता “कितने पौधे लगाए गए” से नहीं बल्कि “कितने वर्षों बाद कितने पेड़ जीवित हैं” से मापी जानी चाहिए।
आखिर पेड़ लगाने की जरूरत ही क्यों है?
बहुत से लोग कहते हैं—
“जब फैक्ट्रियां चल रही हैं, वाहन बढ़ रहे हैं और प्रदूषण लगातार हो रहा है, तो केवल पेड़ लगाने से क्या होगा?”
यह प्रश्न भी उचित है।
उत्तर यह है कि पेड़ अकेले समाधान नहीं हैं, लेकिन समाधान का अनिवार्य हिस्सा जरूर हैं।
पेड़ कई महत्वपूर्ण कार्य करते हैं:
- कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं।
- ऑक्सीजन छोड़ते हैं।
- गर्मी कम करने में मदद करते हैं।
- वर्षा चक्र को प्रभावित करते हैं।
- भूजल संरक्षण में सहायता करते हैं।
- मिट्टी के कटाव को रोकते हैं।
- पक्षियों और अन्य जीवों का आवास बनते हैं।
हालांकि यदि दूसरी ओर लगातार जंगल काटे जाएं, प्लास्टिक बढ़े, उद्योग बिना नियंत्रण के प्रदूषण फैलाएं और वाहन तेजी से बढ़ते रहें, तो केवल पौधरोपण से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी।
पर्यावरण बचाने का सही तरीका क्या है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि पर्यावरण संरक्षण केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए।
इसके लिए समानांतर प्रयास जरूरी हैं—
- पेड़ लगाना और उनकी कम से कम 3–5 वर्ष तक देखभाल करना।
- पुराने पेड़ों को कटने से बचाना।
- वर्षा जल संचयन।
- प्लास्टिक का कम उपयोग।
- सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना।
- स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग।
- औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण।
- स्थानीय जैव विविधता की रक्षा।
क्या हर व्यक्ति को एक पेड़ लगाना चाहिए?
यदि प्रत्येक व्यक्ति केवल एक पौधा लगाकर भूल जाए, तो उसका लाभ सीमित रहेगा।
लेकिन यदि हर व्यक्ति:
- एक पौधा लगाए,
- नियमित पानी दे,
- सुरक्षा करे,
- उसके बड़े होने तक जिम्मेदारी निभाए,
तो कुछ वर्षों में लाखों नए पेड़ तैयार हो सकते हैं।
निष्कर्ष
“एक पेड़ मां के नाम” अभियान का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों में भावनात्मक जुड़ाव पैदा करना है। यह विचार सकारात्मक है। लेकिन किसी भी पौधरोपण अभियान की वास्तविक सफलता केवल रिकॉर्ड बनाने से नहीं, बल्कि वर्षों बाद उन पौधों के जीवित रहने और पर्यावरण पर पड़े वास्तविक प्रभाव से तय होगी।
इसलिए आवश्यकता केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उन्हें पेड़ बनाने की है। साथ ही प्रदूषण कम करने, जल संरक्षण बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करने जैसे कदम भी उतने ही आवश्यक हैं। तभी ऐसे अभियान अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर पाएंगे।

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