धर्म

लीने लली ललतादिक संग… जब श्रीराधा सखियों संग पहुँचीं पुष्प-वाटिका, तब ब्रज में प्रेम का सावन उतर आया

श्री राधा सुधा शतक के 61वें पद में पुष्प-वाटिका की ओर जातीं श्रीराधा रानी अपनी अष्टसखियों के साथ – ब्रज की दिव्य माधुर्य लीला।

ब्रज की रसिक परंपरा में ऐसे अनेक पद मिलते हैं जो केवल कविता नहीं, बल्कि दिव्य दर्शन का माध्यम हैं। श्री हठी जी द्वारा रचित श्री राधा सुधा शतक का 61वाँ सवैया भी ऐसा ही एक मधुर पद है। इसमें श्रीराधा, ललिता आदि अष्टसखियों के साथ एक पुष्प-वाटिका में विराजमान हैं। चारों ओर सुगंधित पुष्प, स्वर्णिम फव्वारे, प्रेम से भरा वातावरण और उस दृश्य को निहारते स्वयं रसिक कवि—यह सब मिलकर ऐसी दिव्य लीला का अनुभव कराते हैं जिसमें मन सहज ही ब्रज की ओर खिंच जाता है।

श्री हठी जी का मधुर पद

लीने लली ललतादिक संग, उमंग सौं श्री वृषभानुदुलारी।
मालती कुंद निवारी गुलाब सु, फूल रही चहुंधा फुलबारी॥
हेम के छूटे फुहारे ‘हठी’, मघवा मध मेघ महा सहकारी।
हौज पै चौज सों मौज भरी बलि, बैठी विलोकत राधिकाप्यारी॥

जब बरसाना की किशोरी निकलीं सखियों के साथ

कल्पना कीजिए…

बरसाने की प्रभात बेला है। मंद-मंद समीर बह रही है। पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को और भी पावन बना रहा है। तभी वृषभानु नंदिनी श्रीराधा अपनी प्रिय सखियों—ललिता, विशाखा, चित्रा, चम्पकलता आदि के साथ पुष्प-वाटिका की ओर पधारती हैं।

सखियों के मुख पर आनंद की झलक है। किसी के हाथ में पुष्पों की टोकरी है, कोई हँसते हुए एक-दूसरे से मधुर वार्तालाप कर रही है। स्वयं श्रीराधा की मुस्कान से ऐसा प्रतीत होता है मानो ब्रज की सम्पूर्ण प्रकृति उनके स्वागत में खिल उठी हो।

बरसाना की पुष्प-वाटिका में ललिता, विशाखा और अन्य अष्टसखियों के साथ भ्रमण करतीं श्रीराधा रानी का दिव्य मधुर लीला चित्र।
बरसाना की पुष्प-वाटिका में अपनी प्रिय सखियों के साथ पधारतीं श्रीराधा रानी। चारों ओर खिले पुष्प, मंद समीर और ब्रज की दिव्य माधुर्य लीला का मनोहारी दृश्य।

फूलों की सुगंध में घुला दिव्य प्रेम

वाटिका में मालती, कुंद, गुलाब और अनेक रंग-बिरंगे पुष्प अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं। ऐसा लगता है मानो प्रत्येक पुष्प श्रीराधा के चरणों का स्पर्श पाने के लिए खिल उठा हो।

मधुमक्खियाँ गुंजार कर रही हैं, भ्रमर पुष्पों पर मंडरा रहे हैं और मंद पवन फूलों की सुगंध को चारों दिशाओं में फैला रही है।

यह कोई साधारण बगीचा नहीं, बल्कि प्रेम की वह भूमि है जहाँ हर पत्ता, हर फूल और हर हवा का झोंका केवल “राधे… राधे…” का ही जप कर रहा है।

स्वर्णिम फव्वारों में उतर आया प्रेम का सावन

वाटिका के मध्य एक सुंदर हौज बना है। उसमें स्वर्णिम फव्वारों से जल की धाराएँ ऊपर उठती हैं।

श्री हठी जी कहते हैं कि वह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है मानो सावन के मेघ स्वयं ब्रज में उतर आए हों। जल की प्रत्येक बूँद प्रेमरस बनकर वातावरण में बिखर रही है।

सखियाँ उस जल को देखकर हँस रही हैं। कोई जल की बूँदों को हथेलियों में समेटने का प्रयास करती है तो कोई श्रीराधा की ओर देखकर मुस्कुरा देती है।

श्रीराधा की मधुर मुस्कान

हौज के किनारे श्रीराधा विराजमान हैं।

उनके मुखकमल पर अद्भुत शांति है। नेत्रों में करुणा, अधरों पर मंद मुस्कान और मुखमंडल पर ऐसा तेज है जिसे देखकर स्वयं चन्द्रमा भी लज्जित हो जाए।

वे पुष्पों को नहीं देख रहीं, बल्कि प्रेम को देख रही हैं।

उनके लिए हर फूल, हर जलधारा और हर समीर श्रीश्यामसुन्दर की स्मृति लेकर आई है।

तभी कान्हा ने ली मधुर मुस्कान की ओट

उधर नंदगाँव के श्यामसुन्दर भी इस पुष्प-वाटिका की ओर आ रहे हैं।

सखा मधुमंगल धीरे से मुस्कराते हुए कहते हैं—

“श्याम! आज राधारानी सखियों के साथ इसी वाटिका में हैं।”

बस इतना सुनना था कि श्रीकृष्ण के अधरों पर मधुर मुस्कान आ गई।

वे धीरे-धीरे वृक्षों की ओट से उस दिशा में बढ़ने लगे।

राधा जी ने प्रत्यक्ष रूप से उनकी ओर देखा भी नहीं, परन्तु प्रेम की भाषा में नेत्रों को शब्दों की आवश्यकता कहाँ होती है?

एक क्षण के लिए दोनों की दृष्टि मिली।

उस एक क्षण में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मानो स्थिर हो गया।

फूल झूम उठे।

भ्रमर रुक गए।

जल की धाराएँ भी जैसे मधुर संगीत सुनने लगीं।

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सखियों की मधुर चेष्टाएँ

ललिता सखी मुस्कुराकर बोली—

“आज तो यह फुलवारी सचमुच धन्य हो गई।”

विशाखा ने एक पुष्प तोड़कर श्रीराधा के केशों में लगा दिया।

मधुमंगल ने धीरे से कान्हा की ओर देखा और हँसते हुए कहा—

“अब तो कुछ कहिए भी!”

परन्तु वहाँ शब्दों की आवश्यकता ही कहाँ थी।

जहाँ प्रेम स्वयं बोल रहा हो, वहाँ मौन ही सबसे मधुर संवाद बन जाता है।

इस लीला का आध्यात्मिक संदेश

यह लीला केवल प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन नहीं है।

यह हमें बताती है कि जब हृदय में श्रीराधा-कृष्ण का प्रेम जागृत होता है, तब संसार की प्रत्येक वस्तु सुंदर दिखाई देने लगती है।

फूल केवल फूल नहीं रहते, वे प्रेम के प्रतीक बन जाते हैं।

जल केवल जल नहीं रहता, वह कृपा की धारा बन जाता है।

और जीवन केवल जीवन नहीं रहता, वह सेवा का अवसर बन जाता है।

रसिक संत हमें क्या सिखाते हैं?

श्री हठी जी इस पद के माध्यम से बताते हैं कि ब्रज की प्रत्येक लीला का उद्देश्य केवल कथा सुनाना नहीं, बल्कि साधक के हृदय में प्रेम का अंकुर जगाना है।

जब मन बार-बार इन लीलाओं का चिंतन करता है, तब धीरे-धीरे संसार का आकर्षण कम होने लगता है और मन श्रीराधा-कृष्ण के चरणों में स्थिर होने लगता है।

यही रसिक संतों की साधना का सार है।


श्री राधा सुधा शतक क्या है?

श्री राधा सुधा शतक ब्रजभाषा में रचित एक अत्यंत मधुर और रसपूर्ण काव्य ग्रंथ है, जिसमें श्रीराधा रानी के अप्रतिम सौंदर्य, करुणा, माधुर्य, सखी-भाव, निकुंज लीलाओं और श्रीराधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का भावपूर्ण वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ में लगभग सौ पद (शतक) हैं और प्रत्येक पद साधक को केवल काव्य का आनंद ही नहीं देता, बल्कि उसे ब्रज के दिव्य भावलोक में प्रवेश कराने का प्रयास करता है। यही कारण है कि रसिक संतों और ब्रजभक्तों के बीच यह ग्रंथ विशेष श्रद्धा के साथ पढ़ा, गाया और मनन किया जाता है।

इसे किसने लिखा और इसकी विशेषता क्या है?

श्री राधा सुधा शतक के रचयिता रसिक संत श्री हठी जी महाराज माने जाते हैं। उन्होंने अपने पदों में श्रीराधा को परम आराध्य स्वरूप मानते हुए ब्रज की नित्य लीलाओं का अत्यंत मधुर और भावमय चित्रण किया है। उनके काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रत्येक पद साधारण वर्णन नहीं, बल्कि साधक के ध्यान का आधार बन जाता है। जब भक्त श्रद्धा और प्रेम से इन पदों का चिंतन करता है, तो उसके मन में ब्रज की लीलाओं का सजीव चित्र उभरने लगता है। प्रस्तुत 61वाँ पद भी उसी श्रृंखला का एक अनुपम उदाहरण है, जिसमें श्रीराधा अपनी प्रिय सखियों के साथ पुष्प-वाटिका में विराजमान हैं और सम्पूर्ण ब्रज प्रेम, सौंदर्य तथा माधुर्य रस से सराबोर दिखाई देता है।

Download: श्री राधा सुधा शतक

श्री हठी जी महाराज का संक्षिप्त परिचय

श्री हठी जी महाराज ब्रज की रसिक भक्ति परंपरा के विख्यात संत-कवि माने जाते हैं। उन्होंने अपने पदों और काव्य के माध्यम से श्रीराधा-कृष्ण की नित्य निकुंज लीलाओं, माधुर्य रस और सखी-भाव का अत्यंत मनोहारी वर्णन किया है। उनकी रचनाओं में ब्रजभाषा की मधुरता, भावों की गहराई और भक्ति की सहज अभिव्यक्ति दिखाई देती है, जिसके कारण उनके पद आज भी ब्रज के रसिक भक्तों द्वारा बड़े प्रेम से गाए और पढ़े जाते हैं।

उनकी प्रमुख कृति ‘श्री राधा सुधा शतक’ है, जिसमें लगभग सौ पदों के माध्यम से श्रीराधा रानी के दिव्य स्वरूप, करुणा, सौंदर्य और श्रीराधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं का रसपूर्ण चित्रण किया गया है। हठी जी महाराज का उद्देश्य केवल काव्य रचना नहीं था, बल्कि साधकों के हृदय में श्रीराधा के प्रति निष्काम प्रेम और ब्रजभाव को जागृत करना था। इसी कारण उनकी रचनाएँ आज भी रसिक संतों और भक्ति साहित्य के प्रेमियों के लिए अत्यंत आदरणीय मानी जाती हैं।


निष्कर्ष

श्री हठी जी का यह सवैया हमें उस दिव्य पुष्प-वाटिका में ले जाता है जहाँ श्रीराधा अपनी सखियों के साथ प्रेममयी आनंद में विराजमान हैं। स्वर्णिम फव्वारे, सुगंधित पुष्प, मंद समीर और श्रीश्यामसुन्दर की मधुर उपस्थिति—इन सबका संगम भक्त के हृदय को प्रेमरस से भर देता है।

यदि हम प्रतिदिन कुछ समय ऐसी लीलाओं का श्रवण और मनन करें, तो हमारा मन भी धीरे-धीरे ब्रजभाव की ओर अग्रसर होने लगेगा।

राधे राधे!

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