रिलेशनशिप

Laajo (Episode 05): दूरी में भी महसूस होती रही मोहब्बत

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अब तक की कहानी…

नदी किनारे हुई मुलाक़ात ने लाजो और प्रेम के रिश्ते को एक नया एहसास दे दिया था। जो बातें अब तक मजाक और शरारत में होती थीं, अब उनमें एक सच्चा लगाव महसूस होने लगा था। उस शाम का पहला आलिंगन दोनों के दिल में एक ऐसी छाप छोड़ गया था जिसे भूलना अब आसान नहीं था।

लेकिन कभी-कभी मोहब्बत का असली एहसास साथ रहने से नहीं…
बल्कि दूर होने के बाद होता है।

अगर आपने पहले के एपिसोड नहीं पढ़े हैं तो यहाँ से शुरू करें:

Laajo (Episode 01): लाजो की रंगों वाली पहली मुलाक़ात

Laajo (Episode 02):  प्रेम की तलाश और लाजो की शरारत

Laajo (Episode 03): शुरू हुई चुलबुली छेड़खानी

लाजो, एक चुलबुली और मासूम लड़की, जिसकी जिंदगी में होली के दिन प्रेम की एंट्री होती है। एक छोटी सी शरारत से शुरू हुई यह मुलाक़ात धीरे-धीरे दिल की नज़दीकियों में बदलने लगती है।

Episode 2 और 3 में उनकी मुलाक़ातें बढ़ती हैं, छेड़खानी और प्यारी बातें दोनों को एक दूसरे की आदत बना देती हैं। बिना कहे ही दोनों के दिल एक दूसरे के लिए धड़कने लगते हैं।

Episode 4 में नदी किनारे हुई मुलाक़ात उनके रिश्ते को एक नया एहसास देती है, जहाँ पहली बार दोनों अपने दिल की नजदीकियों को महसूस करते हैं।

अब कहानी उस मोड़ पर है जहाँ दूरी उन्हें यह एहसास दिलाने वाली है कि उनकी मोहब्बत कितनी गहरी हो चुकी है…

अब आगे…

लाजो और प्रेम की कहानी: दूरी में भी महसूस होती रही मोहब्बत

नदी किनारे हुई मुलाक़ात ने लाजो और प्रेम के रिश्ते को एक नया एहसास दे दिया था। जो बातें अब तक मजाक और शरारत में होती थीं, अब उनमें एक सच्चा लगाव महसूस होने लगा था। उस शाम का पहला आलिंगन, पहला मिलन दोनों के दिल में एक ऐसी छाप छोड़ गया था जिसे भूलना अब आसान नहीं था।

दोनों का करीब आना, एक दूसरे में खुद को महसूस करना, सांसों का मिलना ये सब होने पर अब दूरी बर्दाश्त नहीं हो पा रही थी। बार -बार उन्हीं पलों को याद करके दोनों तरफ तड़प बढ़ रही थी।

लेकिन कभी-कभी मोहब्बत का असली एहसास साथ रहने से नहीं…
बल्कि दूर होने के बाद होता है।

वो घर तो आ गई थी…
पर उसका दिल अभी भी वहीं था…

जहाँ किसी ने पहली बार
उसे अपने करीब महसूस कराया था…

क्या यही पहली मोहब्बत की असली शुरुआत है?

घर लौट आई लाजो… पर दिल वहीं रह गया

लाजो घर तो आ गई थी, मगर आज उसका मन कहीं और ही था। अम्मा कुछ पूछ रही थीं, मगर उसका ध्यान कहीं और था। वो बस हाँ में हाँ मिलाए जा रही थी।

अपने कमरे में जाकर जब वो अकेली बैठी, तो उसने धीरे से अपने दुपट्टे को छुआ। जैसे उस पर अभी भी प्रेम के हाथों की गर्माहट बाकी हो।

उसने खुद से धीरे से कहा —
“ये मुझे क्या हो रहा है…”

आज पहली बार उसे अपनी ही हँसी थोड़ी अलग लगी।

वो चुलबुली जरूर थी…
लेकिन आज उसकी मुस्कान में एक हल्की सी शर्म भी शामिल थी।

उसे बार-बार वही पल याद आ रहा था जब प्रेम ने उसे रोका था।

वो खामोशी…
वो नजदीकी…
वो दिल की धड़कनें…

उसने आँखें बंद कर लीं।

और जैसे वो पल फिर से जीने लगी।

बस एक झलक के लिए
वो उसकी गली तक चला आया…

और खिड़की से उसे सोते हुए देखा…

इतनी सुकून भरी मुस्कान…
जैसे उसकी मोहब्बत का जवाब हो…

प्रेम की खामोशी में बस गई लाजो

उधर प्रेम भी अपने कमरे में बैठा था, खिड़की से आती हवा पर्दों को हिला रही थी, मगर उसका ध्यान कहीं और था। उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान थी।

वो धीरे से बोला —
“कितनी अलग है वो…”

उसे लाजो की हर बात याद आ रही थी।

उसकी हँसी…
उसकी आँखों की चमक…
और वो मासूमियत…

उसे महसूस हो रहा था कि लाजो अब सिर्फ एक मुलाक़ात नहीं रही…

वो अब उसकी आदत बनने लगी है।

उसने पहली बार खुद से स्वीकार किया —

“शायद… मैं सच में उससे प्यार करने लगा हूँ।”

दूरी में भी महसूस होती रही नजदीकी

उस रात दोनों ने एक ही आसमान को देखा।

दोनों अपने-अपने घरों में थे…
मगर ख्याल एक दूसरे के पास थे।

लाजो छत पर आई, चाँद को देखते हुए उसने धीरे से कहा —

“तुम भी अभी यही आसमान देख रहे हो क्या?”

उधर प्रेम भी आसमान की तरफ देख रहा था।

जैसे बिना बोले भी दोनों की बातें हो रही हों।

यह अजीब सा रिश्ता था।

ना कोई वादा हुआ था…
ना कोई इज़हार…

फिर भी दोनों को लग रहा था कि वो एक दूसरे के बहुत करीब हैं।

समाज का डर और दिल की आवाज

लाजो को अचानक अम्मा की बातें याद आईं —

“लड़कियों को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए।”

उसका दिल एक पल को डर गया।

“अगर किसी ने देख लिया तो?”, “अगर घरवालों को पता चल गया तो?”

लेकिन अगले ही पल उसे प्रेम की आँखें याद आईं।

वो सच्चाई…,वो अपनापन…

उसने धीरे से कहा —“क्या प्यार गलत होता है?”

उसके दिल में एक लड़ाई चल रही थी, एक तरफ समाज का डर…दूसरी तरफ दिल की आवाज।

पहली मोहब्बत की पहली तड़प

उस रात शायद दोनों ठीक से सो नहीं पाए।

लाजो करवट बदलती रही।

कभी मुस्कुराती…
कभी आँखें बंद कर लेती…

उसे वो पल याद आया जब प्रेम ने उसे अपने पास खींच लिया था।

उसका दिल तेज धड़कने लगा।

उसने धीरे से अपने चेहरे को हाथों से ढक लिया।

“मैं उसे फिर कब देखूँगी…”

उधर प्रेम भी बिस्तर पर लेटा हुआ छत देख रहा था, उसने महसूस किया कि आज पहली बार उसे किसी का इंतजार अच्छा लग रहा है। यह इंतजार उसे परेशान भी कर रहा था…

और खुश भी।

शायद यही पहली मोहब्बत होती है।

जिसमें मिलने से ज्यादा…
मिलने का इंतजार खूबसूरत लगता है।

दिलों की दूरी… मगर एहसास एक

रात गहरी हो गई थी, मगर दोनों के दिलों में एक ही कहानी चल रही थी। दोनों दूर थे…लेकिन एहसास एक था।

दोनों खामोश थे…लेकिन बातें चल रही थीं।

दोनों अकेले थे…लेकिन तन्हा नहीं थे।

शायद यही मोहब्बत की शुरुआत होती है…

जहाँ किसी का नाम ही मुस्कान बन जाता है।

“तुम्हारी इस मासूम नींद की रखवाली करता रहूँ,
बस यूँ ही खामोशी से तुम्हें देखता रहूँ।
तुम्हें खबर भी ना हो मेरे इस प्यार की,
और मैं हर रात तुम्हारे ख्वाबों में जीता रहूँ…”

प्रेम ने खिड़की से उसे देखते हुए मन ही मन कहा —

“तुम्हें सोते हुए देखकर लगता है जैसे मेरी सारी बेचैनी सो गई हो…”

कुछ पल बाद उसने हल्की मुस्कान के साथ सोचा —

“पता नहीं तुम्हें मेरी आदत कब लगी…
मगर मुझे तो तुम्हारी आदत हो गई है…”

और जाते-जाते उसने एक बार फिर मुड़कर देखा —

“अगर यह मोहब्बत नहीं है…
तो फिर दिल को तुम्हारे पास आने की इतनी ज़िद क्यों है…”

बेचैनी जो रोक न सकी

प्रेम ने बहुत कोशिश की कि वह खुद को समझा सके। उसने सोचा कि यह सिर्फ एक मुलाक़ात का असर है, जो कुछ दिनों में कम हो जाएगा। मगर दिल की बेचैनी मानने को तैयार ही नहीं थी।

आखिर एक शाम वह खुद को रोक नहीं पाया और चुपचाप लाजो की गली तक चला आया। गली में वही सन्नाटा था, मगर उसके दिल की धड़कनें बहुत तेज थीं।

वह धीरे से लाजो के घर के पास पहुँचा। कमरे की खिड़की हल्की सी खुली थी। उसने झिझकते हुए अंदर झाँका।

लाजो सो रही थी।

उसके चेहरे पर एक मासूम सी शांति थी, जैसे दिन भर की चुलबुली लड़की अब सपनों में भी मुस्कुरा रही हो। उसकी बिखरी हुई लटें उसके चेहरे पर आ रही थीं और हल्की हवा उन्हें हिला रही थी।

प्रेम की आँखों में एक अजीब सा सुकून उतर आया।

वह धीरे से मुस्कुराया और मन ही मन बोला —
“तुम्हें देख लेता हूँ तो दिल को चैन मिल जाता है…”

कुछ पल वह वहीं खड़ा उसे देखता रहा, फिर बिना आवाज किए वापस मुड़ गया।

क्योंकि अब उसे यकीन हो चुका था…

यह सिर्फ पसंद नहीं रही…
यह मोहब्बत बन चुकी थी।

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