बदलती जीवनशैली, बढ़ती महंगाई और नौकरी के कारण बार-बार शहर बदलने की जरूरत ने भारतीय परिवारों की खरीदारी की आदतों को भी बदल दिया है। अब बड़ी संख्या में लोग सोफा, बेड, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, एयर कंडीशनर और RO जैसी चीजें खरीदने के बजाय मासिक किराये या सब्सक्रिप्शन पर लेना पसंद कर रहे हैं।
किराये पर सामान देने वाली कंपनियां केवल उत्पाद उपलब्ध नहीं करातीं, बल्कि डिलीवरी, इंस्टॉलेशन, मरम्मत और शहर बदलने पर सामान ट्रांसफर करने जैसी सुविधाएं भी देती हैं। छोटे फर्नीचर का किराया करीब 79 रुपये प्रतिमाह से शुरू हो सकता है। वहीं, कुछ घरेलू उपकरण लगभग 149 रुपये प्रतिमाह की शुरुआती कीमत पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
हालांकि, कम मासिक किराया देखकर तुरंत किसी योजना को चुनना समझदारी नहीं है। सब्सक्रिप्शन लेने से पहले सिक्योरिटी डिपॉजिट, न्यूनतम अवधि, डैमेज शुल्क, रिटर्न पॉलिसी और कुल भुगतान जैसी शर्तों को समझना जरूरी है।
क्या होती है सब्सक्रिप्शन इकोनॉमी?
सब्सक्रिप्शन इकोनॉमी एक ऐसा कारोबारी मॉडल है, जिसमें ग्राहक किसी वस्तु का मालिक बनने के बजाय एक निश्चित अवधि तक उसका उपयोग करने के लिए मासिक या वार्षिक शुल्क देता है। सरल शब्दों में कहें तो ग्राहक वस्तु नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली सुविधा के लिए भुगतान करता है।
ओटीटी प्लेटफॉर्म, मोबाइल प्लान और सॉफ्टवेयर सेवाओं के बाद अब यह मॉडल फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, कार और घरेलू उपयोग की मशीनों तक पहुंच चुका है। इसमें ग्राहक को एक साथ बड़ी रकम खर्च नहीं करनी पड़ती और जरूरत समाप्त होने पर वह सामान वापस भी कर सकता है।
यह मॉडल खासतौर पर उन लोगों को आकर्षित कर रहा है, जिनकी नौकरी ट्रांसफरेबल है, जो किराये के मकान में रहते हैं या कुछ वर्षों के लिए किसी दूसरे शहर में काम करने जाते हैं।
भारत में तेजी से बढ़ रहा किराये के सामान का बाजार
उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार, भारत में फर्नीचर और घरेलू उपकरणों के किराये का बाजार लगभग 33,500 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। वर्ष 2032 तक इसके 46,000 करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान लगाया जा रहा है।
फ्यूचर मार्केट इनसाइट्स के एक अनुमान के अनुसार, भारत की सब्सक्रिप्शन इकोनॉमी सालाना करीब 16.6 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। यह वृद्धि बताती है कि भारतीय ग्राहक धीरे-धीरे “हर चीज का मालिक होना जरूरी है” वाली सोच से आगे बढ़ रहे हैं।
इसके बावजूद भारत में यह कारोबारी मॉडल हर शहर में समान रूप से सफल नहीं है। महानगरों और तेजी से विकसित हो रहे बड़े शहरों में इसकी मांग अधिक दिखाई देती है, जबकि छोटे शहरों में उपलब्धता और ग्राहकों की स्वीकार्यता अभी सीमित है।
युवा क्यों खरीदने के बजाय किराये पर सामान ले रहे हैं?
आज के युवा बेहतर नौकरी और करियर के अवसरों के लिए एक शहर से दूसरे शहर जाते रहते हैं। ऐसे में भारी फर्नीचर और घरेलू उपकरण खरीदना उनके लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी बन सकता है। स्थान बदलते समय सामान की पैकिंग, ट्रांसपोर्ट और दोबारा इंस्टॉलेशन पर अलग खर्च होता है।
किराये का मॉडल उन्हें कम शुरुआती खर्च में घर व्यवस्थित करने की सुविधा देता है। नौकरी या शहर बदलने पर सामान वापस किया जा सकता है। यही कारण है कि अविवाहित पेशेवरों, विद्यार्थियों, नवविवाहित जोड़ों और अस्थायी रूप से किसी शहर में रहने वाले परिवारों के बीच यह विकल्प लोकप्रिय हो रहा है।
कोविड महामारी के बाद घर से काम करने का चलन बढ़ने पर भी लोगों ने वर्क डेस्क, ऑफिस चेयर, लैपटॉप टेबल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को किराये पर लेना शुरू किया। इसके बाद कंपनियों ने अपनी सेवाओं का दायरा तेजी से बढ़ाया।
छोटे फर्नीचर और घरेलू उपकरण का कितना किराया लगता है?
अलग-अलग कंपनियों, शहरों और उत्पादों के अनुसार किराया बदल सकता है। शुरुआती योजनाओं में छोटे फर्नीचर करीब 79 रुपये प्रतिमाह और कुछ घरेलू उपकरण लगभग 149 रुपये प्रतिमाह से उपलब्ध कराए जाते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, एक बेडरूम वाले घर यानी 1BHK को आवश्यक फर्नीचर और घरेलू उपकरणों से तैयार करने का शुरुआती किराया करीब 514 से 570 रुपये प्रतिमाह बताया गया है। हालांकि, इतनी कम कीमत सामान्यतः शुरुआती पैकेज, प्रचार प्रस्ताव या चुनिंदा उत्पादों पर लागू हो सकती है।
ग्राहक को ध्यान रखना चाहिए कि दिखाया गया शुरुआती किराया अंतिम भुगतान से अलग हो सकता है। सामान की गुणवत्ता, ब्रांड, मॉडल, किराये की अवधि और स्थान के आधार पर वास्तविक मासिक खर्च बढ़ सकता है।
डिलीवरी, इंस्टॉलेशन और सिक्योरिटी डिपॉजिट का क्या नियम है?
कई रेंटल कंपनियां बेड, गद्दे, फ्रिज, टीवी और वॉशिंग मशीन जैसे उत्पादों की डिलीवरी तथा इंस्टॉलेशन मुफ्त देती हैं। फिर भी हर कंपनी और शहर में नियम समान नहीं होते। कुछ कंपनियां दूरी, फ्लोर या लिफ्ट उपलब्ध न होने पर अतिरिक्त शुल्क ले सकती हैं।
अधिकांश योजनाओं में ग्राहक से रिफंडेबल सिक्योरिटी डिपॉजिट भी लिया जाता है। यह राशि सामान की कीमत और श्रेणी के आधार पर तय होती है। सामान सही स्थिति में लौटाने और सभी भुगतान पूरे होने के बाद यह डिपॉजिट वापस किया जाता है।
सब्सक्रिप्शन लेने से पहले यह जरूर जांचें कि सिक्योरिटी डिपॉजिट कितने दिनों में लौटाया जाएगा और उसमें से किन परिस्थितियों में कटौती हो सकती है।
किराये के सामान की मरम्मत की जिम्मेदारी किसकी होती है?
सामान के सामान्य उपयोग के दौरान तकनीकी खराबी आने पर उसकी मरम्मत और नियमित मेंटेनेंस की जिम्मेदारी आमतौर पर कंपनी की होती है। उदाहरण के लिए, फ्रिज का कूलिंग सिस्टम खराब होने या वॉशिंग मशीन में तकनीकी समस्या आने पर कंपनी सर्विस दे सकती है।
लेकिन ग्राहक की लापरवाही से उत्पाद टूटने, जलने या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त होने पर कंपनी शुल्क वसूल सकती है। कुछ कंपनियां लगभग 1,000 रुपये तक का डैमेज-वेवर विकल्प भी देती हैं। इसके अंतर्गत तय सीमा तक होने वाले नुकसान पर ग्राहक को अतिरिक्त भुगतान से सुरक्षा मिल सकती है।
डैमेज-वेवर बीमा जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन इसकी सीमाएं अलग होती हैं। इसलिए उसके नियम ध्यान से पढ़ना जरूरी है।
कार सब्सक्रिप्शन और रोजाना किराये का विकल्प
फर्नीचर और घरेलू उपकरणों के अलावा कार सब्सक्रिप्शन का बाजार भी बढ़ रहा है। कुछ प्लेटफॉर्म पर कार का किराया करीब 499 रुपये प्रतिदिन से शुरू हो सकता है, जबकि प्रीमियम SUV के लिए रोजाना शुल्क लगभग 999 रुपये या इससे अधिक हो सकता है।
बजट श्रेणी की कारों का सामान्य किराया करीब 600 से 800 रुपये प्रतिदिन के बीच देखा जा सकता है। लंबे समय के कार सब्सक्रिप्शन में मासिक किराया लगभग 15,000 रुपये या इससे अधिक हो सकता है।
कार सब्सक्रिप्शन में बीमा, रोड टैक्स और नियमित सर्विसिंग जैसी कुछ लागतें कंपनी वहन कर सकती है। इसके बावजूद ईंधन, टोल टैक्स, पार्किंग, ओवरस्पीडिंग चालान और दुर्घटना में स्वयं वहन की जाने वाली राशि ग्राहक को देनी पड़ सकती है।
कार खरीदना बेहतर है या सब्सक्रिप्शन लेना?
यदि किसी व्यक्ति को कई वर्षों तक एक ही कार इस्तेमाल करनी है और वह लंबी अवधि तक एक शहर में रहने वाला है, तो कार खरीदना आर्थिक रूप से बेहतर हो सकता है। कार खरीदने पर लोन पूरा होने के बाद वाहन ग्राहक की संपत्ति बन जाता है।
इसके विपरीत, जिन लोगों को कुछ महीनों या एक-दो वर्षों के लिए कार चाहिए, उनके लिए सब्सक्रिप्शन सुविधाजनक हो सकता है। इसमें डाउन पेमेंट, रजिस्ट्रेशन, बीमा नवीनीकरण और कार बेचने की चिंता कम हो जाती है।
सही निर्णय लेने के लिए सब्सक्रिप्शन की कुल अवधि का भुगतान जोड़ें और उसकी तुलना कार की EMI, डाउन पेमेंट, बीमा, सर्विसिंग तथा रीसेल वैल्यू से करें।
RO खरीदने के बजाय सब्सक्रिप्शन का चलन
अच्छी गुणवत्ता वाला RO वाटर प्यूरीफायर खरीदने में लगभग 10,000 से 30,000 रुपये तक खर्च हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त फिल्टर बदलने, मेंटेनेंस और सर्विसिंग की लागत भी ग्राहक को वहन करनी पड़ती है।
कुछ कंपनियां लगभग 429 रुपये प्रतिमाह से RO सब्सक्रिप्शन उपलब्ध करा रही हैं। इसमें मशीन, इंस्टॉलेशन, फिल्टर बदलना और नियमित सर्विसिंग शामिल हो सकती है। ऐसे परिवारों के लिए यह मॉडल उपयोगी हो सकता है, जो शुरुआती बड़ी रकम खर्च नहीं करना चाहते।
हालांकि, कई वर्षों तक लगातार किराया देने पर कुल भुगतान मशीन की वास्तविक कीमत से अधिक हो सकता है। इसलिए RO सब्सक्रिप्शन चुनने से पहले दो से तीन वर्षों का पूरा खर्च निकालना चाहिए।
क्या शहर बदलने पर किराये का सामान साथ ले जा सकते हैं?
कई कंपनियां ग्राहक को सब्सक्रिप्शन ट्रांसफर करने या सामान वापस करने की सुविधा देती हैं। यदि कंपनी की सेवा नए शहर में उपलब्ध है, तो वह सामान को शिफ्ट करने या वहां दूसरा उत्पाद उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है।
कुछ कंपनियां देश के 21 से 30 से अधिक शहरों में अपनी सेवाएं देने का दावा करती हैं। इनमें इंदौर, जयपुर, लखनऊ और चंडीगढ़ जैसे शहर भी शामिल हैं। फिर भी शहर बदलने पर मुफ्त ट्रांसफर मिलेगा, यह मानकर नहीं चलना चाहिए। इंटरसिटी ट्रांसपोर्ट, पैकिंग और दोबारा इंस्टॉलेशन पर अलग शुल्क लग सकता है।
किराये पर सामान लेने के प्रमुख फायदे
सब्सक्रिप्शन मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ग्राहक को एक साथ बड़ी रकम खर्च नहीं करनी पड़ती। कम मासिक भुगतान में जरूरी फर्नीचर और उपकरण इस्तेमाल किए जा सकते हैं। तकनीकी खराबी आने पर मरम्मत की जिम्मेदारी भी अक्सर कंपनी संभालती है।
जो लोग बार-बार शहर बदलते हैं, उनके लिए सामान बेचने या ट्रांसपोर्ट करने की परेशानी कम हो जाती है। ग्राहक अपनी जरूरत और बजट के अनुसार उत्पाद अपग्रेड या बदल भी सकता है।
यह सुविधा उन लोगों के लिए भी उपयोगी है, जो किसी महंगे उत्पाद को खरीदने से पहले कुछ महीनों तक इस्तेमाल करके देखना चाहते हैं।
सब्सक्रिप्शन मॉडल के नुकसान भी समझें
कम मासिक किराया आकर्षक लगता है, लेकिन लंबी अवधि में यही भुगतान काफी बड़ा हो सकता है। तीन या चार वर्षों तक किराया देने के बावजूद ग्राहक उस सामान का मालिक नहीं बनता। इसके उलट EMI पर खरीदी गई वस्तु भुगतान पूरा होने के बाद उसकी संपत्ति बन जाती है।
समय से पहले सब्सक्रिप्शन बंद करने पर जुर्माना लग सकता है। उत्पाद को नुकसान पहुंचने, भुगतान में देरी या तय सीमा से अधिक उपयोग होने पर अतिरिक्त शुल्क भी लिया जा सकता है।
कई बार विज्ञापन में दिखाया गया कम किराया केवल चुनिंदा शहरों, पुराने मॉडल या लंबी लॉक-इन अवधि के साथ उपलब्ध होता है। टैक्स, डिलीवरी, प्रोसेसिंग और डिपॉजिट जोड़ने के बाद वास्तविक खर्च बढ़ सकता है।
सब्सक्रिप्शन लेने से पहले किन बातों की जांच करें?
किसी भी फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, RO या कार की योजना चुनने से पहले उसका कुल खर्च निकालना जरूरी है। केवल मासिक किराये के आधार पर फैसला नहीं करना चाहिए। देखें कि एक, दो या तीन वर्ष में आपको कुल कितना भुगतान करना होगा और उसी वस्तु को खरीदने में कितना खर्च आएगा।
कॉन्ट्रैक्ट में न्यूनतम किराया अवधि, समय से पहले रद्द करने का शुल्क, सिक्योरिटी डिपॉजिट, मरम्मत की शर्तें और डैमेज पॉलिसी पढ़ें। यह भी जांचें कि उत्पाद नया है या पहले इस्तेमाल किया गया है।
कंपनी की वेबसाइट के अलावा Google Reviews, सोशल मीडिया शिकायतें और ग्राहक सहायता की स्थिति देखना भी उपयोगी होगा। भुगतान करने से पहले सामान की तस्वीरें और उसकी मौजूदा स्थिति का वीडियो सुरक्षित रख सकते हैं।
क्या मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए किराये का मॉडल फायदेमंद है?
मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए इसका लाभ उनकी जरूरत और उपयोग की अवधि पर निर्भर करता है। यदि परिवार लंबे समय तक एक ही घर और शहर में रहने वाला है, तो बेड, सोफा, फ्रिज और वॉशिंग मशीन जैसी जरूरी चीजें खरीदना अधिक फायदेमंद हो सकता है।
यदि परिवार को कुछ महीनों के लिए दूसरे शहर में रहना है, तब किराये पर सामान लेना बेहतर विकल्प बन सकता है। इससे एकमुश्त खर्च और स्थानांतरण की परेशानी कम होती है।
इसलिए सब्सक्रिप्शन को सस्ता मानना हमेशा सही नहीं है। यह मुख्य रूप से लचीलेपन और सुविधा का मॉडल है। ग्राहक उस सुविधा के बदले हर महीने शुल्क देता है।
निष्कर्ष
भारत में सब्सक्रिप्शन इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है। फर्नीचर और घरेलू उपकरणों से शुरू हुआ यह चलन अब RO, कार और कई दूसरी सेवाओं तक पहुंच चुका है। नौकरी के कारण शहर बदलने वाले युवाओं, विद्यार्थियों और अस्थायी निवास वाले परिवारों के लिए यह विकल्प सुविधाजनक हो सकता है।
वहीं, लंबे समय तक एक ही वस्तु का उपयोग करने वाले परिवारों को किराये और खरीद की कुल लागत की तुलना जरूर करनी चाहिए। कम मासिक किराया देखकर लिया गया निर्णय लंबी अवधि में महंगा भी साबित हो सकता है। सही विकल्प वही है, जो ग्राहक की जरूरत, बजट और उपयोग की अवधि के अनुकूल हो।
नोट: लेख में दी गई कीमतें और बाजार संबंधी आंकड़े प्रकाशित रिपोर्ट में उपलब्ध जानकारी पर आधारित हैं। वास्तविक किराया, डिपॉजिट और सुविधाएं कंपनी, शहर, उत्पाद तथा योजना के अनुसार बदल सकती हैं।

Comments