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US Solar Tariffs: Waaree Energies और Premier Energies पर कितना असर?

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US के फैसले से बाजार में घबराहट

अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारत से आयात होने वाले सोलर सेल और पैनलों पर लगभग 126% की प्रारंभिक काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगाने का निर्णय लिया। इस खबर के बाद भारतीय शेयर बाजार में सोलर सेक्टर के शेयरों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला।

हालांकि दिन के अंत तक कुछ रिकवरी जरूर आई, लेकिन प्रमुख कंपनियां दबाव में ही बंद हुईं।

किन कंपनियों के शेयर गिरे?

  • Waaree Energies का शेयर लगभग 10.5% गिरकर ₹2,705 पर बंद हुआ।
  • Premier Energies 5.9% गिरकर ₹731.5 पर बंद हुआ।
  • विक्रम सोलर, सोलेक्स एनर्जी, वेब्सोल एनर्जी और सात्विक ग्रीन एनर्जी में भी 4% से 8% तक की गिरावट दर्ज की गई।
  • वहीं, बोरोसिल रिन्यूएबल्स करीब 2% की बढ़त के साथ बंद हुआ।

यह गिरावट मुख्य रूप से निवेशकों की चिंता को दर्शाती है, खासकर उन कंपनियों के लिए जिनकी अमेरिका में मजबूत निर्यात मौजूदगी है।

Waaree Energies ने दी सफाई

Waaree Energies के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर हितेश दोशी ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी ड्यूटी केवल भारत में निर्मित सोलर सेल्स पर लागू होती है।

उन्होंने बताया कि कंपनी भारत में बने सोलर सेल्स से बने पैनलों का अमेरिका को निर्यात नहीं करती। अधिकतर भारतीय कंपनियां कम शुल्क वाले देशों से सोलर सेल आयात करके भारत में पैनल तैयार करती हैं और फिर उन्हें निर्यात करती हैं।

इस वजह से वास्तविक असर सीमित हो सकता है।

अमेरिका भारतीय सोलर कंपनियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

  • 2024 में अमेरिका को भारतीय सोलर निर्यात लगभग 792.6 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया।
  • यह 2022 की तुलना में लगभग 9 गुना अधिक है।
  • Waaree Energies की लगभग एक-तिहाई तिमाही आय विदेशों से आती है।
  • विक्रम सोलर के ऑर्डर बुक का लगभग 20% हिस्सा निर्यात से जुड़ा है।

इससे स्पष्ट है कि अमेरिका भारतीय सोलर कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार बन चुका है।

वैल्यूएशन और ग्रोथ की संभावनाएं

प्रमुख ब्रोकरेज फर्म Motilal Oswal ने गिरावट के बावजूद अपना सकारात्मक रुख बनाए रखा है।

Waaree Energies

  • FY28 के अनुमानित EBITDA पर 13x मल्टीपल के आधार पर मूल्यांकन
  • लक्ष्य मूल्य: ₹3,514
  • मौजूदा स्तर से लगभग 27% संभावित बढ़त

Premier Energies

  • घरेलू मॉड्यूल बिजनेस पर 13x मल्टीपल
  • बैटरी मैन्युफैक्चरिंग जैसे नए व्यवसायों पर 10x
  • लक्ष्य मूल्य: ₹1,000
  • लगभग 36% संभावित बढ़त

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका में सोलर बाजार आने वाले वर्षों में 50 GW से बढ़कर 70-80 GW तक पहुंच सकता है,

जोखिम भी कम नहीं

हालांकि सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन कुछ बड़े जोखिम भी मौजूद हैं:

  1. भारत की कुल सोलर उत्पादन क्षमता 160 GW से अधिक है, जबकि घरेलू मांग केवल 40-45 GW है।
  2. यदि निर्यात मार्ग बाधित हुआ तो घरेलू बाजार में ओवरसप्लाई हो सकती है।
  3. अमेरिका की ओर से एंटी-डंपिंग पर अलग निर्णय भी आने वाला है।
  4. Waaree ने US कस्टम जांच के लिए ₹295 करोड़ का प्रावधान रखा है, जो संभावित जांच या अनुपालन मुद्दों का संकेत देता है।

आगे क्या? भारतीय सोलर सेक्टर की दिशा क्या होगी?

यदि अमेरिकी उच्च टैरिफ लंबे समय तक लागू रहते हैं, तो सबसे पहले कंपनियों के मुनाफे (मार्जिन) पर दबाव देखने को मिल सकता है। क्योंकि निर्यात आधारित कंपनियों को या तो कीमतें कम करनी पड़ सकती हैं या अतिरिक्त शुल्क का कुछ हिस्सा खुद वहन करना पड़ सकता है। परिणामस्वरूप, प्रति यूनिट लाभ घट सकता है। इसके अलावा, नए ऑर्डर मिलने की गति भी धीमी पड़ सकती है, खासकर तब जब अमेरिकी खरीदार वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश शुरू करें।

दूसरी ओर, यदि अमेरिका में एंटी-डंपिंग से जुड़ा अगला फैसला भी कड़ा आता है, तो अनिश्चितता और बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में निवेशकों की धारणा (Investor Sentiment) कमजोर पड़ सकती है और शेयरों में अस्थिरता बनी रह सकती है। इसलिए अल्पकाल में उतार-चढ़ाव से इनकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि, सकारात्मक पक्ष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत में सोलर ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। केंद्र सरकार की पीएलआई (Production Linked Incentive) योजना, 2030 तक 500 GW नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य, और राज्य सरकारों की सोलर परियोजनाएं इस सेक्टर को मजबूत आधार दे रही हैं। इसके परिणामस्वरूप, यदि निर्यात में अस्थायी गिरावट आती भी है, तो घरेलू मांग कुछ हद तक संतुलन प्रदान कर सकती है।

इसके अतिरिक्त, कई भारतीय कंपनियां अपने सप्लाई चेन को विविध (Diversify) करने की दिशा में काम कर रही हैं। यानी वे केवल एक देश पर निर्भर रहने के बजाय यूरोप, मध्य पूर्व और अन्य उभरते बाजारों में भी अवसर तलाश रही हैं। यह रणनीति दीर्घकाल में जोखिम कम कर सकती है।

अंततः, निवेशकों के लिए यह समय भावनात्मक निर्णय लेने का नहीं, बल्कि तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर रणनीति बनाने का है। जहां अल्पकाल में अस्थिरता बनी रह सकती है, वहीं दीर्घकाल में मजबूत बैलेंस शीट, विविध बाजार और सरकारी समर्थन वाली कंपनियां बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। इसलिए फिलहाल सेक्टर से जुड़ी नीतिगत घोषणाओं, अमेरिकी व्यापार फैसलों और कंपनियों की तिमाही आय रिपोर्ट पर सतर्क नजर रखना बेहद जरूरी होगा।

FAQs

Q1. US टैरिफ क्या है?

यह वह अतिरिक्त शुल्क है जो अमेरिका उन उत्पादों पर लगाता है जिन्हें वह सरकारी सब्सिडी से लाभान्वित मानता है।

Q2. क्या Waaree Energies पर सीधा असर पड़ेगा?

कंपनी का दावा है कि वह भारत में बने सोलर सेल से बने पैनलों का निर्यात अमेरिका को नहीं करती, इसलिए असर सीमित हो सकता है।

Q3. Premier Energies का भविष्य कैसा है?

यदि अमेरिकी ऑर्डर घटते हैं तो दबाव आ सकता है, लेकिन घरेलू मांग सहारा दे सकती है।

Q4. क्या यह गिरावट खरीदारी का मौका है?

कुछ विश्लेषक इसे दीर्घकालीन अवसर मानते हैं, लेकिन जोखिमों को ध्यान में रखना जरूरी है।

Q5. भारतीय सोलर सेक्टर का भविष्य कैसा है?

सरकार की नवीकरणीय ऊर्जा नीति और बढ़ती मांग के कारण दीर्घकालीन संभावनाएं सकारात्मक मानी जा रही हैं।

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