मध्यप्रदेश में किसान की आमदनी अब केवल गेहूं, धान, सोयाबीन या दूसरी पारंपरिक फसलों तक सीमित न रहे, इसके लिए सरकार कृषि के साथ उद्यानिकी, पशुपालन और डेयरी को जोड़ने पर जोर दे रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गुना के बलराम कृषि महोत्सव में इसी मॉडल को किसानों की आर्थिक मजबूती से जोड़ा। सरकार का लक्ष्य उद्यानिकी का रकबा बढ़ाने के साथ दुग्ध उत्पादन में प्रदेश की हिस्सेदारी बढ़ाना भी है। सवाल यह है कि इस बदलाव से किसान को फायदा कैसे होगा और इसके रास्ते में चुनौतियां क्या हैं?
बलराम कृषि महोत्सव में मुख्यमंत्री ने क्या कहा?
गुना कृषि उपज मंडी परिसर में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव को वर्चुअली संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि कृषक कल्याण वर्ष में सरकार किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए कृषि के साथ पशुपालन और उद्यानिकी को बढ़ावा दे रही है।
गुना की पहचान धनिया और गुलाब उत्पादन से भी है। ऐसे में सरकार का प्रयास है कि जिले के अधिक किसानों को उद्यानिकी से जोड़ा जाए। मुख्यमंत्री ने कुंभराज के धनिये को GI टैग मिलने की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया।
इसके साथ प्रदेश में उद्यानिकी का रकबा 20 प्रतिशत बढ़ाने का लक्ष्य बताया गया है।
लेकिन यहां असली सवाल यह है कि फसल का रकबा बढ़ने से किसान की आय कैसे बढ़ेगी?
इसका जवाब केवल ज्यादा उत्पादन में नहीं, बल्कि खेती के स्वरूप को बदलने में छिपा है।
सरकार कृषि के साथ पशुपालन और उद्यानिकी क्यों जोड़ रही है?
पारंपरिक खेती में किसान की आय काफी हद तक एक या दो फसलों पर निर्भर हो सकती है। मौसम खराब हुआ, उत्पादन घटा या मंडी में भाव कम मिला तो पूरे सीजन की कमाई प्रभावित हो सकती है।
इसके मुकाबले यदि किसान खेती के साथ सब्जी, फल, फूल, मसाला फसल, पशुपालन या डेयरी जैसी गतिविधियां जोड़ता है तो आय के एक से अधिक स्रोत बन सकते हैं।
इसे आसान भाषा में समझें।
यदि किसी किसान की आय केवल सोयाबीन और गेहूं से आती है तो उसकी आर्थिक स्थिति मुख्य रूप से इन्हीं फसलों के उत्पादन और बाजार भाव पर निर्भर रहेगी। लेकिन वही किसान खेती के साथ दो-चार दुधारू पशु रखता है, उपलब्ध जमीन के एक हिस्से में उच्च मूल्य वाली उद्यानिकी फसल लेता है और स्थानीय बाजार से जुड़ता है तो उसे साल के अलग-अलग समय में आय मिलने की संभावना बनती है।
यही agricultural diversification यानी कृषि विविधीकरण का मूल विचार है।
उद्यानिकी पर इतना जोर क्यों?
फल, सब्जी, फूल, मसाले और औषधीय पौधों जैसी उद्यानिकी फसलों में कई मामलों में प्रति एकड़ अधिक मूल्य पैदा करने की क्षमता होती है। हालांकि इनके साथ लागत, खराब होने का जोखिम, भंडारण और बाजार की चुनौती भी जुड़ी होती है।
मध्यप्रदेश में उद्यानिकी पहले से कृषि अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड भी राज्यवार उद्यानिकी क्षेत्र और उत्पादन के आंकड़े संकलित करता है।
इसलिए सरकार का उद्यानिकी क्षेत्र बढ़ाने का लक्ष्य केवल ज्यादा फल-सब्जी पैदा करने का मामला नहीं है। इसका फायदा तभी पूरा मिलेगा जब इसके साथ कोल्ड स्टोरेज, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग, परिवहन और बाजार की व्यवस्था भी बढ़े।
किसान को उद्यानिकी से फायदा कैसे हो सकता है?
उद्यानिकी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसान के सामने पारंपरिक अनाज और तिलहन के अलावा अधिक मूल्य वाली फसल चुनने का विकल्प आता है।
दूसरा लाभ स्थानीय विशेषता का है। जिस इलाके की जलवायु और मिट्टी किसी खास फसल के अनुकूल है, वहां उसी उत्पाद को स्थानीय ब्रांड के रूप में विकसित किया जा सकता है।
गुना के लिए धनिया इसका अच्छा उदाहरण बन सकता है।
कुंभराज धनिया और GI टैग: किसान के लिए इसका क्या मतलब है?
कुंभराज धनिया केवल एक स्थानीय फसल नहीं, बल्कि इसे क्षेत्रीय पहचान वाले कृषि उत्पाद के रूप में स्थापित करने का प्रयास चल रहा है।
GI यानी Geographical Indication किसी ऐसे उत्पाद की भौगोलिक पहचान से जुड़ा संकेत है, जिसकी विशेष गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या दूसरी विशेषताएं उस क्षेत्र से संबंधित हों।
Intellectual Property India के GI Registry रिकॉर्ड में Kumbhraj Coriander की Application No. 1073 दर्ज है। आवेदन Kumbhraj Dhaniya Krishak Sahakari Samiti Sanstha Maryadit की ओर से 11 अप्रैल 2023 को दाखिल किया गया था। उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड में इसकी स्थिति फिलहाल “Examination” दिखाई गई है।
इसलिए GI को लेकर सबसे सही स्थिति यह है कि कुंभराज धनिया के GI पंजीकरण की प्रक्रिया चल रही है और राज्य सरकार ने इसके जल्द पूरा होने की उम्मीद जताई है।
GI मिलने के बाद क्या धनिया अपने आप महंगा बिकने लगेगा?
जरूरी नहीं।
यही वह बात है जो केवल सरकारी घोषणा वाली खबर और वास्तविक विश्लेषण में फर्क पैदा करती है।
GI किसी उत्पाद को पहचान और कानूनी संरक्षण देने में मदद कर सकता है, लेकिन किसान को ज्यादा कीमत मिलने के लिए उसके बाद भी कई काम जरूरी होते हैं—उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखना, सही पैकेजिंग करना, किसान उत्पादक संगठनों को बाजार से जोड़ना, खरीदार तैयार करना और ब्रांड का प्रचार करना।
यानी GI अवसर पैदा करता है, अधिक कमाई की गारंटी नहीं देता।
कुंभराज मंडी में धनिये के भाव में भी समय के साथ उतार-चढ़ाव दिखाई देता है। जुलाई 2026 के उपलब्ध बाजार आंकड़ों में अलग-अलग दिनों में कीमतों में उल्लेखनीय अंतर दर्ज किया गया। इससे साफ है कि केवल किसी क्षेत्र की पहचान मजबूत होना पर्याप्त नहीं है; बाजार और मांग भी किसान की अंतिम कमाई तय करते हैं।
पशुपालन को खेती से जोड़ने का फायदा क्या है?
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पशुपालन में नस्ल सुधार और डेयरी विकास पर भी जोर दिया है। सरकार ने प्रदेश के दुग्ध उत्पादन की राष्ट्रीय हिस्सेदारी को 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।
पशुपालन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि यह किसान को फसल कटने का इंतजार किए बिना नियमित नकदी प्रवाह दे सकता है।
उदाहरण के लिए दूध बेचने वाले किसान को रोज या निश्चित अंतराल पर आय मिल सकती है। पशुओं से मिलने वाला गोबर जैविक खाद या प्राकृतिक खेती में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह खेत और पशु एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं।
लेकिन यहां भी केवल पशु खरीद लेना पर्याप्त नहीं है।
बेहतर नस्ल, पशु चिकित्सा सुविधा, टीकाकरण, चारे की उपलब्धता, दूध संग्रह केंद्र और उचित कीमत—ये सभी व्यवस्थाएं साथ चलेंगी तभी डेयरी किसान के लिए लाभकारी व्यवसाय बन पाएगी।
युवाओं के लिए खेती में नया अवसर कहां है?
सरकार युवाओं को भी कृषि, पशुपालन और उद्यानिकी गतिविधियों से जोड़ने की बात कर रही है। खासकर उन्नत गोपालन और डेयरी विकास को रोजगार से जोड़ा जा रहा है।
आज खेती का मतलब केवल खेत में फसल उगाना नहीं रह गया है।
युवा नर्सरी, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, पैकेजिंग, कृषि मशीनरी सेवा, ड्रोन आधारित कृषि सेवा, डिजिटल मार्केटिंग, कृषि उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री और किसान उत्पादक संगठन जैसी गतिविधियों में भी काम कर सकते हैं।
यदि स्थानीय उत्पादों को ब्रांड बनाया जाता है तो गांव में उत्पादन के साथ प्रोसेसिंग और मार्केटिंग के रोजगार भी तैयार हो सकते हैं।
खाद्य प्रसंस्करण क्यों महत्वपूर्ण है?
मुख्यमंत्री ने खंडवा जिले के किसान प्रतिनिधियों से चर्चा के दौरान खाद्य प्रसंस्करण के माध्यम से किसानों को लाभ पहुंचाने की बात भी कही।
इसे टमाटर के उदाहरण से समझा जा सकता है।
यदि उत्पादन अधिक होने पर बाजार में ताजा टमाटर की कीमत गिर जाती है तो किसान के सामने उसे जल्दी बेचने की मजबूरी होती है। लेकिन उसी क्षेत्र में प्रोसेसिंग की व्यवस्था हो तो टमाटर से प्यूरी, सॉस या दूसरे उत्पाद बनाए जा सकते हैं।
इसी तरह फल, सब्जियां और मसाले भी प्रोसेस होकर अधिक समय तक बाजार में रखे जा सकते हैं।
इससे खेती में value addition यानी मूल्य संवर्धन जुड़ता है।
यानी किसान के उत्पाद की कीमत केवल खेत से निकली कच्ची उपज के आधार पर तय होने के बजाय प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग से आगे बढ़ सकती है।
सिंचाई और बिजली इस पूरे मॉडल की बुनियाद क्यों हैं?
उद्यानिकी और विविधीकृत खेती की चर्चा सिंचाई के बिना अधूरी है।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने खंडवा के किसान प्रतिनिधियों से चर्चा में कहा कि सरकार हर किसान के खेत तक पर्याप्त पानी पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके साथ किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने की बात भी कही गई है।
उद्यानिकी की कई फसलों में समय पर सिंचाई बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसलिए किसान को उच्च मूल्य वाली फसल अपनाने के लिए प्रेरित करने से पहले विश्वसनीय सिंचाई व्यवस्था जरूरी है।
पानी उपलब्ध होगा तो किसान के लिए फसल बदलने का जोखिम कुछ हद तक कम होगा।
प्राकृतिक खेती भी इस नीति का हिस्सा
गुना विधायक पन्नालाल शाक्य ने बलराम कृषि महोत्सव में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की बात कही। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने भी किसानों को प्राकृतिक खेती और उन्नत कृषि तकनीकों की जानकारी दी।
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के पीछे लागत कम करने, मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने और रासायनिक इनपुट पर निर्भरता घटाने जैसे तर्क दिए जाते हैं।
हालांकि किसान के नजरिए से नई पद्धति अपनाते समय उत्पादन, बाजार, श्रम और शुरुआती बदलाव के प्रभाव को भी समझना जरूरी है। इसलिए प्रशिक्षण और स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक मार्गदर्शन महत्वपूर्ण होगा।
क्या केवल 20% उद्यानिकी रकबा बढ़ाने से किसानों की आय बढ़ जाएगी?
नहीं। रकबा बढ़ना इस योजना का केवल पहला हिस्सा है।
असल परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि बढ़े हुए उत्पादन को खरीदने वाला बाजार मौजूद है या नहीं।
यदि किसी क्षेत्र में हजारों किसान एक ही सब्जी या फल की खेती करने लगें और उसी अनुपात में कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग और बाजार न बढ़े तो ज्यादा उत्पादन उल्टा कीमत गिरा सकता है।
इसलिए सरकार के लक्ष्य को चार स्तरों पर देखना होगा—
उत्पादन → भंडारण → प्रसंस्करण → बाजार
इन चारों की श्रृंखला मजबूत होगी तभी उद्यानिकी विस्तार का वास्तविक फायदा किसान तक पहुंच पाएगा।
किसान के लिए सबसे बड़ा फायदा क्या हो सकता है?
इस पूरी नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू एक ही आय स्रोत पर किसान की निर्भरता कम करना है।
फसल से मौसमी आय, डेयरी से नियमित आय, उद्यानिकी से उच्च मूल्य वाली उपज और प्रोसेसिंग से मूल्य संवर्धन—यदि ये सभी एक साथ काम करते हैं तो किसान की आर्थिक स्थिति पारंपरिक एकल फसल मॉडल की तुलना में ज्यादा मजबूत हो सकती है।
इसके साथ सिंचाई, बिजली और बाजार उपलब्ध हो तो किसान के लिए नई फसल अपनाने का जोखिम भी कम हो सकता है।
लेकिन सरकार के सामने पांच बड़ी चुनौतियां भी हैं
पहली चुनौती छोटे किसानों की शुरुआती निवेश क्षमता है। उद्यानिकी, ड्रिप सिंचाई, पशुपालन या डेयरी शुरू करने में पैसा लगता है।
दूसरी चुनौती बाजार की है। ज्यादा उत्पादन तभी लाभ देगा जब उसकी मांग भी हो।
तीसरी चुनौती कोल्ड चेन और स्टोरेज की है। फल और सब्जियां जल्दी खराब होती हैं।
चौथी चुनौती प्रशिक्षण की है। पारंपरिक फसल उगाने वाला किसान अचानक उच्च मूल्य वाली उद्यानिकी फसल में जाए तो उसे तकनीकी जानकारी की जरूरत होगी।
और पांचवीं चुनौती घोषणा को जमीन तक पहुंचाने की है। योजना का असली मूल्य इस बात से तय होगा कि गांव के छोटे और सीमांत किसान तक सिंचाई, प्रशिक्षण, बाजार और वित्तीय सहायता कितनी आसानी से पहुंचती है।
निष्कर्ष: खेती को व्यवसाय की पूरी श्रृंखला से जोड़ने की कोशिश
मध्यप्रदेश सरकार की मौजूदा दिशा को केवल “कृषि उत्पादन बढ़ाने” की योजना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका बड़ा विचार खेती को पशुपालन, डेयरी, उद्यानिकी, खाद्य प्रसंस्करण और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग से जोड़ना है।
कागज पर यह मॉडल किसान के लिए आय के कई रास्ते खोल सकता है।
खासकर गुना जैसे जिले में कुंभराज धनिया और गुलाब जैसे स्थानीय उत्पादों की पहचान को बाजार से जोड़ना महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इसी तरह पशुपालन किसान को नियमित आय का दूसरा स्रोत दे सकता है।
लेकिन अंतिम सफलता उत्पादन के आंकड़ों से नहीं मापी जानी चाहिए।
असल कसौटी यह होगी कि किसान की प्रति एकड़ शुद्ध आय कितनी बढ़ी, उसे उपज का बेहतर दाम मिला या नहीं, बाजार तक पहुंच आसान हुई या नहीं और खेती से होने वाला आर्थिक जोखिम कितना कम हुआ।
यही वे आंकड़े होंगे जो आने वाले वर्षों में बताएंगे कि कृषि, पशुपालन और उद्यानिकी को साथ लेकर चलने वाला यह मॉडल वास्तव में किसान कल्याण का मॉडल बना या केवल लक्ष्य और घोषणाओं तक सीमित रहा।
FAQ
कुंभराज धनिया क्या है?
यह मध्यप्रदेश के गुना जिले के कुंभराज क्षेत्र से जुड़ा धनिया है, जिसकी विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान है। इसके GI पंजीकरण के लिए आवेदन किया गया है।
क्या कुंभराज धनिया को GI टैग मिल चुका है?
Intellectual Property India के उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड में Kumbhraj Coriander की GI Application No. 1073 की स्थिति फिलहाल “Examination” दिखाई गई है। इसलिए इसे अभी “GI टैग मिल चुका है” लिखने के बजाय पंजीकरण प्रक्रिया में बताना अधिक उचित है।
GI टैग से किसान को क्या फायदा हो सकता है?
इससे क्षेत्रीय उत्पाद को अलग पहचान, ब्रांडिंग और कानूनी संरक्षण मिल सकता है। बेहतर मार्केटिंग और गुणवत्ता नियंत्रण के साथ प्रीमियम बाजार तक पहुंचने की संभावना भी बढ़ सकती है।
मध्यप्रदेश सरकार उद्यानिकी क्यों बढ़ाना चाहती है?
उद्देश्य किसानों को पारंपरिक खेती के साथ फल, सब्जी, फूल और मसाला जैसी अधिक मूल्य वाली फसलों से जोड़कर आय के अतिरिक्त स्रोत तैयार करना है।
पशुपालन किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
खेती से आय आमतौर पर फसल कटने के बाद मिलती है, जबकि दूध जैसी गतिविधियों से किसान को अधिक नियमित नकदी प्रवाह मिल सकता है। इससे केवल फसल पर निर्भरता कम हो सकती है।
क्या उद्यानिकी में पारंपरिक खेती से ज्यादा कमाई होती है?
कई उद्यानिकी फसलों में प्रति एकड़ अधिक कमाई की संभावना होती है, लेकिन लागत और जोखिम भी अधिक हो सकते हैं। पानी, बाजार, भंडारण और तकनीकी जानकारी के बिना केवल फसल बदलना लाभ की गारंटी नहीं है।

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