दिल्ली

नेपाल में तबाही का असली कारण क्या? भूकंप से ग्लेशियर टूटने और फिर आई जलप्रलय की पूरी कहानी

नेपाल के रासुवा में फ्लैश फ्लड के बाद तबाही और राहत-बचाव का दृश्य

रासुवा/काठमांडू। नेपाल-तिब्बत सीमा पर बुधवार को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने हिमालयी क्षेत्र में एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है। रासुवा जिले में अचानक आई बाढ़ ने सड़कें, पुल, मकान और बिजली से जुड़ा बुनियादी ढांचा तबाह कर दिया। बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।

आखिर अचानक इतना पानी आया कहां से?

पहली नजर में इसे सामान्य बारिश से जुड़ी बाढ़ माना जा सकता था, लेकिन उपलब्ध शुरुआती वैज्ञानिक संकेत एक अलग कहानी बताते हैं। माना जा रहा है कि नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास आए 4.4 तीव्रता के भूकंप ने ऊंचाई वाले इलाके में बर्फ और चट्टानों के अस्थिर हिस्से को प्रभावित किया। इसके बाद एक बड़े Ice-Rock Avalanche की घटना हुई।

सैटेलाइट तस्वीरों के शुरुआती विश्लेषण में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटने के संकेत मिले हैं। बर्फ, चट्टान और मलबे का यह विशाल हिस्सा नीचे गिरकर नदी तंत्र में पहुंचा और देखते ही देखते पानी का प्रवाह बेहद खतरनाक हो गया।

भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, पीएम मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री से की बात

नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से फोन पर बातचीत की और बाढ़ के कारण हुई जान-माल की क्षति पर गहरी संवेदना व्यक्त की। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस कठिन समय में भारत के लोग नेपाल के अपने भाई-बहनों के साथ पूरी मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने नेपाल को हरसंभव मानवीय सहायता उपलब्ध कराने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई।

प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि भारतीय दल बचाव और राहत कार्यों में नेपाली अधिकारियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। भारत की ओर से राहत एवं बचाव प्रयासों में आवश्यक सहयोग जारी है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा, “प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बात की और नेपाल में बाढ़ के कारण हुई जानमाल की हानि पर संवेदना व्यक्त की। इस कठिन समय में भारत के लोग नेपाल में अपने भाई-बहनों के साथ एकजुटता से खड़े हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि भारत नेपाल को हरसंभव मानवीय सहायता प्रदान करने के लिए तैयार है और दोनों देशों के दल बचाव एवं राहत प्रयासों के लिए निकटता से समन्वय कर रहे हैं।

नेपाल की इस प्राकृतिक आपदा के बीच भारत की यह पहल दोनों देशों के बीच गहरे मानवीय और मैत्रीपूर्ण संबंधों को भी दर्शाती है।

नदी बनी विनाश की सबसे बड़ी वजह

जब इतनी बड़ी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा नदी में पहुंचता है तो नदी का सामान्य प्रवाह बाधित हो जाता है। कहीं पानी रुक सकता है और अचानक बांध टूटने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। कहीं मलबे के साथ पानी कई गुना तेजी से नीचे की ओर बढ़ सकता है।

रासुवा में भी कुछ ऐसा ही हुआ। नदी के जलस्तर में बेहद कम समय में तेज वृद्धि हुई और पानी अपने साथ भारी चट्टानें, मिट्टी तथा अन्य मलबा लेकर नीचे की ओर बढ़ा। इस अचानक आई लहर ने नदी किनारे मौजूद बस्तियों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया।

क्या केवल भूकंप को जिम्मेदार माना जा सकता है?

अभी नहीं। यही इस पूरी घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

भूकंप को संभावित ट्रिगर माना जा रहा है, लेकिन आपदा का वास्तविक तंत्र कई प्राकृतिक प्रक्रियाओं के एक साथ जुड़ने से बना हो सकता है। भूकंप ने ढलान या बर्फ-चट्टान के कमजोर हिस्से को अस्थिर किया हो, उसके बाद हिमस्खलन या ग्लेशियर टूटने की घटना हुई हो और फिर नदी में अचानक भारी मात्रा में मलबा पहुंचने से फ्लैश फ्लड बनी हो।

इसलिए फिलहाल इसे केवल “भूकंप से आई बाढ़” कहना वैज्ञानिक रूप से पूरी तस्वीर नहीं बताता। अंतिम निष्कर्ष के लिए विस्तृत भूवैज्ञानिक और सैटेलाइट जांच जरूरी है।

हिमालय क्यों बन रहा है ज्यादा संवेदनशील?

नेपाल की भौगोलिक स्थिति इसे प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील बनाती है। हिमालय में भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन और ग्लेशियरों से जुड़ी घटनाएं पहले भी बड़े पैमाने पर तबाही मचा चुकी हैं।

इसके अलावा विशेषज्ञ लंबे समय से ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और जलवायु परिवर्तन को हिमालयी क्षेत्र के बढ़ते जोखिम से जोड़ रहे हैं। बढ़ता तापमान बर्फ और ग्लेशियरों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है, जबकि कमजोर पर्वतीय ढलानों पर मानवीय गतिविधियां आपदा के प्रभाव को और बढ़ा सकती हैं।

2015 की त्रासदी की याद भी ताजा

नेपाल का रासुवा क्षेत्र भूकंप और उससे जुड़ी आपदाओं के लिए नया नहीं है। वर्ष 2015 के विनाशकारी भूकंप के दौरान इसी व्यापक हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन और हिमस्खलन ने भारी तबाही मचाई थी।

इस बार भी भूकंपीय हलचल और ऊंचाई वाले क्षेत्र की अस्थिरता ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि हिमालय में प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी और शुरुआती चेतावनी प्रणाली को कितना मजबूत किया गया है।

असली सबक क्या है?

नेपाल की यह त्रासदी केवल एक बाढ़ की कहानी नहीं है। यह बताती है कि हिमालय में एक छोटी-सी प्राकृतिक घटना भी कई दूसरी घटनाओं को जन्म दे सकती है—भूकंप से ढलान अस्थिर होना, बर्फ-चट्टान का टूटना, नदी में मलबा गिरना और फिर अचानक फ्लैश फ्लड आना।

यानी भविष्य की आपदा रोकने के लिए केवल बारिश और नदी के जलस्तर की निगरानी पर्याप्त नहीं होगी। ऊंचाई वाले ग्लेशियर क्षेत्रों में भूकंपीय गतिविधि, बर्फ-चट्टान की स्थिरता, नदी में संभावित अवरोध और सैटेलाइट आधारित निगरानी को एक साथ जोड़ना होगा।

नेपाल की यह घटना एक चेतावनी है—हिमालय में आपदा अक्सर एक घटना से नहीं, बल्कि घटनाओं की पूरी श्रृंखला से पैदा होती है।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related News