भोपाल में इलेक्ट्रॉनिक कचरे यानी E-Waste के निपटान को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के सामने पहुंचे एक मामले में आरोप लगाया गया है कि राजधानी में निकलने वाले ई-वेस्ट का केवल करीब 10 प्रतिशत हिस्सा ही वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस किया जा रहा है, जबकि बाकी करीब 90 प्रतिशत ई-वेस्ट अनधिकृत कबाड़ इकाइयों और असंगठित व्यवस्था के जरिए नष्ट या प्रोसेस किया जा रहा है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए NGT ने पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित कर तथ्यात्मक स्थिति और अब तक की गई कार्रवाई की रिपोर्ट चार सप्ताह में देने को कहा है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भोपाल नगर निगम और संबंधित विभागों को भी नोटिस जारी किए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को होनी है।
कैसे NGT तक पहुंचा भोपाल के E-Waste का मामला?
यह मामला पर्यावरण कार्यकर्ता नितिन सक्सेना की शिकायत से सामने आया। NGT के रिकॉर्ड के अनुसार 6 मई 2026 को ट्रिब्यूनल के Public Grievances Portal पर शिकायत की गई थी, जिसे बाद में Original Application No. 450/2026 के रूप में दर्ज किया गया।
शिकायत में कहा गया कि भोपाल में बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हो रहा है, लेकिन उसके सुरक्षित और वैज्ञानिक निपटान की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।
याचिका के साथ पेश की गई जानकारी में दावा किया गया कि केवल लगभग 10 प्रतिशत ई-वेस्ट ही वैज्ञानिक प्रक्रिया से नष्ट या रिसाइकिल हो रहा है। शेष करीब 90 प्रतिशत ई-वेस्ट अनधिकृत कबाड़ियों या स्क्रैप यूनिटों तक पहुंच रहा है। शहर में ऐसी 250 से अधिक अनधिकृत इकाइयों के होने का भी आरोप लगाया गया है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि फिलहाल ये आंकड़े याचिका और उसके साथ दी गई रिपोर्ट में किए गए दावों पर आधारित हैं। NGT द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट के बाद ही वास्तविक स्थिति और जिम्मेदारी अधिक स्पष्ट हो सकेगी।
भोपाल में हर साल करीब 415 टन E-Waste निकलने का दावा
NGT के आदेश में उद्धृत आंकड़ों के अनुसार भोपाल से हर साल करीब 415 टन ई-वेस्ट निकलता है। पूरे मध्य प्रदेश में सालाना लगभग 5,000 मीट्रिक टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न होने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में मध्य प्रदेश के कुछ प्रमुख शहरों में ई-वेस्ट उत्पादन के आंकड़े भी बताए गए हैं। इनमें इंदौर में करीब 800 टन, भोपाल में 415 टन, ग्वालियर में 400 टन और उज्जैन में लगभग 315 टन सालाना ई-वेस्ट पैदा होने का उल्लेख है।
यही वजह है कि मामला केवल पुराने मोबाइल फोन या कंप्यूटर फेंकने तक सीमित नहीं रह जाता। बड़ी मात्रा में उत्पन्न होने वाला इलेक्ट्रॉनिक कचरा यदि अधिकृत recycling chain तक नहीं पहुंचता है तो इसका असर हवा, पानी, मिट्टी और अंततः लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
आखिर E-Waste खतरनाक क्यों होता है?
पुराने मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टीवी, प्रिंटर, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट, बैटरी से जुड़े उपकरण और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान देखने में सामान्य कचरे जैसे लग सकते हैं, लेकिन इनके अंदर कई तरह की धातुएं और रासायनिक तत्व मौजूद होते हैं।
CPCB के अनुसार ई-वेस्ट में एक तरफ सोना, चांदी, प्लेटिनम और पैलेडियम जैसी मूल्यवान धातुएं हो सकती हैं, वहीं इसमें लेड, कैडमियम, मरकरी और आर्सेनिक जैसी भारी धातुएं तथा अन्य विषैले पदार्थ भी पाए जा सकते हैं। इन्हें गलत तरीके से तोड़ने, जलाने या धातु निकालने की प्रक्रिया स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
भोपाल से जुड़े मामले में भी खुले में इलेक्ट्रॉनिक कचरा जलाने और तोड़ने से लेड, मरकरी, कैडमियम और क्रोमियम जैसे तत्वों के हवा, मिट्टी और पानी में पहुंचने का आरोप लगाया गया है। याचिका में बच्चों के न्यूरोलॉजिकल विकास, किडनी और सांस संबंधी बीमारियों तक के खतरे की आशंका जताई गई है।
मेडिकल E-Waste को लेकर NGT की चिंता ज्यादा गंभीर
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू मेडिकल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से जुड़ा है।
NGT ने X-ray मशीन, CT Scanner और PET Scanner जैसे उपकरणों के निपटान से जुड़े संभावित radiation risk पर भी चिंता जताई है। ट्रिब्यूनल ने इस मुद्दे को nuclear और radiological emergency preparedness के नजरिए से देखने की जरूरत बताई।
NGT ने यह सवाल भी उठाया कि यदि किसी discarded medical equipment में radioactive material मौजूद हो तो उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक सुरक्षित तरीके से पहुंचाने और अंतिम निपटान की स्पष्ट जिम्मेदारी किस एजेंसी की होगी।
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि ऐसे उपकरणों को सामान्य नागरिक क्षेत्रों में फेंका नहीं जाना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर निर्माता के पास वापस भेजकर radioactive material को सुरक्षित तरीके से हटाने की व्यवस्था होनी चाहिए।
NGT ने क्यों बनाई पांच सदस्यीय High-Level Committee?
मामले में कई विभागों की जिम्मेदारी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। इसलिए केवल नगर निगम या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट पर निर्भर रहने के बजाय NGT ने अलग-अलग विशेषज्ञ संस्थाओं को साथ लेकर समिति गठित की है।
पांच सदस्यीय समिति में इन क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है—
- Ministry of Environment, Forest and Climate Change (MoEF&CC)
- Central Pollution Control Board (CPCB)
- Health Department
- Electrical and Electronics Department
- Madhya Pradesh Pollution Control Board
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस समिति की nodal agency बनाया गया है।
समिति को भोपाल और संबंधित क्षेत्रों में ई-वेस्ट प्रबंधन की वास्तविक स्थिति की जांच कर चार सप्ताह में factual और action-taken report देने को कहा गया है।
समिति किन सवालों की जांच कर सकती है?
सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि भोपाल में वास्तव में कितना ई-वेस्ट निकलता है और उसमें से कितना अधिकृत recycling system तक पहुंच रहा है।
इसके अलावा जांच का फोकस इस बात पर भी रहने की संभावना है कि कथित 250 से अधिक अनधिकृत scrap units कहां संचालित हो रही हैं, उनमें किस तरीके से इलेक्ट्रॉनिक सामान तोड़ा या जलाया जा रहा है और क्या ऐसी गतिविधियों से हवा, पानी अथवा मिट्टी का प्रदूषण हो रहा है।
याचिका में भोपाल के E-Waste Clinic के बंद या निष्क्रिय होने का भी आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता ने इसे दोबारा प्रभावी तरीके से संचालित करने, collection centres बढ़ाने और unauthorized processing units के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
भारत में E-Waste के लिए क्या नियम हैं?
भारत में वर्तमान में E-Waste (Management) Rules, 2022 लागू हैं। इन्हें केंद्र सरकार ने 2 नवंबर 2022 को अधिसूचित किया था और ये 1 अप्रैल 2023 से प्रभावी हुए। इन नियमों ने पुराने E-Waste (Management) Rules, 2016 की जगह ली।
नियमों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इलेक्ट्रॉनिक कचरे का प्रबंधन इस तरह किया जाए कि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।
इस व्यवस्था में Extended Producer Responsibility यानी EPR महत्वपूर्ण है। इसके तहत इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियों पर उनके उत्पादों से उत्पन्न ई-वेस्ट के recycling targets और अधिकृत recycling system को समर्थन देने की जिम्मेदारी तय की गई है।
यानी पुराना मोबाइल, कंप्यूटर या कोई अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सामान्य घरेलू कचरे की तरह फेंक देना इस पूरी व्यवस्था के उद्देश्य के विपरीत है।
आम लोगों की भी है अहम भूमिका
ई-वेस्ट की समस्या केवल सरकार या नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं है। घरों और दफ्तरों से निकलने वाले पुराने मोबाइल, चार्जर, लैपटॉप, कंप्यूटर, टीवी, प्रिंटर या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अक्सर कबाड़ी को बेच दिए जाते हैं।
कई बार उपभोक्ता को यह पता ही नहीं होता कि इसके बाद वह इलेक्ट्रॉनिक सामान कहां जाता है और उसे किस तरीके से तोड़ा या recycle किया जाता है।
इसलिए नागरिकों को कोशिश करनी चाहिए कि पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अधिकृत collection centre, निर्माता के take-back programme या registered recycler को ही दिए जाएं।
ई-वेस्ट को जलाना, खुले में फेंकना या सामान्य घरेलू कचरे में मिला देना पर्यावरण के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
भोपाल के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
भोपाल तेजी से बढ़ता शहर है और यहां मोबाइल फोन, कंप्यूटर, घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लेकर अस्पतालों तथा संस्थानों में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
ऐसे में आने वाले वर्षों में ई-वेस्ट भी बढ़ना तय है।
यदि अभी से collection, segregation, authorised recycling और निगरानी की मजबूत व्यवस्था नहीं बनाई गई तो ई-वेस्ट शहर के लिए ऐसा प्रदूषण स्रोत बन सकता है जो दिखाई कम देता है लेकिन लंबे समय तक मिट्टी, पानी और स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
NGT की High-Level Committee इसलिए अहम है क्योंकि उसके सामने सिर्फ यह पता लगाना नहीं है कि 90 प्रतिशत वाला दावा कितना सही है, बल्कि यह भी देखना है कि भोपाल में ई-वेस्ट का पूरा सिस्टम वास्तव में काम कैसे कर रहा है।
अब आगे क्या होगा?
NGT ने संबंधित सरकारी विभागों और एजेंसियों से जवाब मांगा है और पांच सदस्यीय समिति को चार सप्ताह में अपनी रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं।
अब समिति की रिपोर्ट से यह साफ हो सकेगा कि भोपाल में वैज्ञानिक तरीके से dispose होने वाले ई-वेस्ट का वास्तविक प्रतिशत कितना है, कितनी unauthorized units काम कर रही हैं, पर्यावरण को कितना नुकसान हुआ है और जिम्मेदार एजेंसियों ने अब तक क्या कार्रवाई की है।
मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है।
भोपाल के लिए यह मामला सिर्फ कचरा प्रबंधन का नहीं बल्कि भविष्य की urban health और environmental safety का भी सवाल है। अगर आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो शहर में ई-वेस्ट collection और recycling व्यवस्था को बड़े स्तर पर सुधारने की आवश्यकता सामने आ सकती है।

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