भारत की महान लोकगायिका, पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी और पद्म विभूषण सम्मान से अलंकृत तीजन बाई का रविवार को 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे पिछले कुछ समय से बीमार थीं और उनका इलाज रायपुर स्थित एम्स (AIIMS) में चल रहा था। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज, जीवंत अभिनय और अनूठी प्रस्तुति के जरिए छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला पंडवानी को देश-विदेश में नई पहचान दिलाई। उनका जाना भारतीय लोक संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।
लंबे समय से थीं अस्वस्थ, रायपुर एम्स में चल रहा था इलाज
मिली जानकारी के अनुसार, तीजन बाई पिछले कई दिनों से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रही थीं। उनका उपचार रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में चल रहा था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली।
जैसे ही उनके निधन की खबर सामने आई, देशभर के कलाकारों, साहित्यकारों, राजनीतिक नेताओं और उनके प्रशंसकों ने गहरा शोक व्यक्त किया। प्रधानमंत्री समेत कई प्रमुख नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए भारतीय लोककला में उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।
कौन थीं तीजन बाई? जानिए उनका संक्षिप्त जीवन परिचय
तीजन बाई का जन्म वर्ष 1956 में छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाओं और लोकसंगीत में विशेष रुचि थी। उन्होंने अपने नाना से पंडवानी की शिक्षा ग्रहण की और बहुत कम उम्र में मंच पर प्रस्तुति देना शुरू कर दिया।
हालांकि, उस समय पंडवानी गायन में महिलाओं की भागीदारी लगभग नहीं के बराबर थी। सामाजिक विरोध और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर वे उस कला की सबसे बड़ी पहचान बन गईं, जिसे कभी केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित माना जाता था।
पंडवानी को दुनिया भर में दिलाई नई पहचान
तीजन बाई ने पंडवानी की कापालिक शैली को लोकप्रिय बनाया, जिसमें कलाकार केवल गायन ही नहीं, बल्कि अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमाओं के माध्यम से महाभारत की कथाओं को जीवंत कर देता है।
उनकी प्रस्तुतियों ने भारत के साथ-साथ यूरोप, एशिया और कई अन्य देशों में भी दर्शकों का दिल जीता। वे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बन गई थीं और भारतीय लोककला की वैश्विक दूत के रूप में जानी जाती थीं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जताया शोक
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रख्यात पंडवानी गायिका तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि तीजन बाई अद्वितीय प्रतिभा की धनी कलाकार थीं, जिन्होंने अपनी ओजस्वी प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय लोक परंपराओं को नई पहचान दी।
मुख्यमंत्री ने यह श्रद्धांजलि अपने आधिकारिक X (पूर्व में Twitter) अकाउंट पर साझा की।
मुख्यमंत्री ने अपने शोक संदेश में कहा कि तीजन बाई ने पंडवानी गायन और भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाया। कला जगत में उनका योगदान हमेशा अविस्मरणीय रहेगा। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति तथा शोकाकुल परिवार और उनके लाखों प्रशंसकों को इस कठिन समय में संबल प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की।
पंडवानी क्या है? जानिए महाभारत की इस अनोखी लोकगायन परंपरा के बारे में
पंडवानी छत्तीसगढ़ की सबसे प्रसिद्ध लोककला परंपराओं में से एक है। इस लोकगायन शैली में महाभारत की कथाओं को गीत, संगीत, अभिनय और संवाद के माध्यम से जीवंत रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कलाकार केवल गाते ही नहीं, बल्कि अपने हाव-भाव, आवाज के उतार-चढ़ाव और अभिनय से ऐसा वातावरण बना देते हैं कि दर्शकों को महाभारत का पूरा दृश्य आंखों के सामने घटित होता हुआ महसूस होने लगता है।
यही वजह है कि पंडवानी केवल एक गायन शैली नहीं, बल्कि भारतीय लोकनाट्य और कहानी कहने की समृद्ध परंपरा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
महाभारत की कहानियों को लोकभाषा में पहुंचाने का माध्यम बनी पंडवानी
पंडवानी का सबसे बड़ा उद्देश्य महाभारत जैसे महान ग्रंथ की कथाओं को आम लोगों तक उनकी अपनी भाषा में पहुंचाना रहा है। पुराने समय में जब हर व्यक्ति संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन नहीं कर पाता था, तब लोक कलाकार गांव-गांव जाकर गीतों और कथाओं के माध्यम से धर्म, नीति, वीरता और जीवन मूल्यों का संदेश सुनाते थे।
इस लोक परंपरा के जरिए भीम, अर्जुन, श्रीकृष्ण, द्रौपदी, कर्ण और अन्य पात्रों की कहानियां लोगों तक सहज और रोचक तरीके से पहुंचीं। यही कारण है कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में पंडवानी को बड़े सम्मान के साथ सुना जाता है।
उनकी आवाज भले ही अब हमेशा के लिए शांत हो गई हो, लेकिन महाभारत की उनकी गूंजती हुई पंडवानी, आने वाली पीढ़ियों को भारतीय लोक परंपरा से जोड़ती रहेगी। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत होगी।
पंडवानी की दो प्रमुख शैलियां कौन-सी हैं?
समय के साथ पंडवानी की दो प्रमुख शैलियां विकसित हुईं—वेदमती शैली और कापालिक शैली।
वेदमती शैली अपेक्षाकृत शांत और पारंपरिक मानी जाती है। इसमें कलाकार बैठकर गायन करता है और कथाओं को सरल ढंग से प्रस्तुत करता है।
वहीं कापालिक शैली अधिक नाटकीय और प्रभावशाली होती है। इसमें कलाकार मंच पर खड़े होकर अभिनय, संवाद, आवाज के उतार-चढ़ाव और प्रतीकात्मक मुद्राओं के माध्यम से महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देता है। तीजन बाई इसी शैली की सबसे बड़ी प्रतिनिधि मानी जाती थीं और उन्होंने इसे विश्व स्तर पर नई पहचान दिलाई।
कई प्रतिष्ठित सम्मानों से हुईं सम्मानित
अपने लंबे और शानदार कला जीवन में तीजन बाई को अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। इनमें प्रमुख हैं—
- पद्म श्री (1988)
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
- पद्म भूषण (2003)
- पद्म विभूषण (2019)
इन सम्मानों ने भारतीय लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में उनके अद्वितीय योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया।
क्यों हमेशा याद रखी जाएंगी तीजन बाई?
तीजन बाई ने यह साबित किया कि लोककला केवल गांवों तक सीमित रहने वाली परंपरा नहीं है। उन्होंने पंडवानी जैसी सदियों पुरानी कला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया और दुनिया को भारतीय लोक संस्कृति की समृद्ध विरासत से परिचित कराया।
उनकी प्रस्तुतियों में केवल गायन नहीं, बल्कि अभिनय, ऊर्जा, भावनाएं और महाभारत के पात्रों की जीवंत अभिव्यक्ति दिखाई देती थी। यही कारण है कि उन्हें सुनने वाले दर्शक भाषा न समझने के बावजूद उनकी कला से प्रभावित हो जाते थे।
आज भले ही तीजन बाई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज, उनकी शैली और भारतीय लोककला के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बना रहेगा। उनकी पंडवानी की गूंज भारतीय संस्कृति के इतिहास में सदैव अमर रहेगी।

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