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गांव की बरसात: जब बरसों बाद अपने गांव लौटा… तब समझ आया कि बारिश सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि यादों का दूसरा नाम है

बरसों बाद अपने गांव की बारिश को निहारता एक व्यक्ति, सामने हरियाली, कच्ची सड़क और धान के खेतों का मनमोहक दृश्य।

भोपाल में रहते-रहते कई साल बीत गए। जिंदगी की रफ्तार इतनी तेज हो गई कि सुबह ऑफिस और शाम घर के बीच पता ही नहीं चला कि बचपन कब पीछे छूट गया। सड़कें चौड़ी होती गईं, इमारतें ऊंची होती गईं और मोबाइल की स्क्रीन पर दुनिया सिमटती चली गई। लेकिन दिल के किसी कोने में एक जगह आज भी वैसी ही बसी रही… मेरा गांव।

मध्य प्रदेश के सिरोंज के पास बसा मेरा छोटा-सा गांव। नक्शे पर शायद बहुत बड़ा नहीं होगा, लेकिन मेरी दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह वही है। खासकर तब, जब सावन की पहली बारिश वहां दस्तक देती है।

इस बार बरसों बाद बारिश के मौसम में गांव जाने का मौका मिला। जैसे ही बस से उतरा, पहली सांस के साथ जो मिट्टी की सोंधी खुशबू आई, उसने महसूस करा दिया कि मैं सिर्फ अपने गांव नहीं लौटा हूं… मैं अपने बचपन में लौट आया हूं।

गांव की बारिश… जहां हर बूंद एक कहानी सुनाती है

शहर में बारिश का मतलब अक्सर ट्रैफिक जाम, पानी से भरी सड़कें और देर से ऑफिस पहुंचने की चिंता होता है। लेकिन गांव में बारिश की पहली बूंद गिरते ही पूरा माहौल बदल जाता है।

सड़क किनारे लगे नीम और पीपल के पेड़ जैसे मुस्कुराने लगते हैं। खेतों में धान की रोपाई शुरू हो जाती है। दूर तक फैली हरियाली आंखों को ऐसा सुकून देती है, जिसे किसी महंगे रिसॉर्ट में भी महसूस नहीं किया जा सकता।

मैं देर तक खेत की मेड़ पर खड़ा रहा। सामने बारिश की महीन बूंदें गिर रही थीं और हवा में भीगी मिट्टी की खुशबू घुली हुई थी। उसी पल लगा कि शहर में रहते हुए हम कितनी बड़ी दौलत से दूर हो गए हैं।

बरसों बाद भी वही आवाजें… जो कभी बदली ही नहीं

बारिश की रिमझिम के बीच अचानक कानों में वही पुरानी आवाजें गूंजने लगीं।

कहीं मेंढकों की टर्र-टर्र…
कहीं झींगुरों का संगीत…
पेड़ों पर बैठे पक्षियों की चहचहाहट…
और दूर मंदिर की घंटी…

भोपाल में हर दिन गाड़ियों के हॉर्न सुनते-सुनते शायद मैं इन आवाजों को भूल चुका था।

लेकिन गांव पहुंचते ही एहसास हुआ कि प्रकृति का संगीत किसी भी प्लेलिस्ट से कहीं ज्यादा खूबसूरत होता है।

बारिश की खुशबू ने बचपन की अलमारी खोल दी

बारिश इंसान को सिर्फ भिगोती नहीं है, वह यादों को भी जगा देती है।

मुझे याद आया…

कैसे हम दोस्त बारिश शुरू होते ही घर से भाग जाते थे।
कागज की नाव बनाकर नालियों में छोड़ देते थे।
कीचड़ में फिसलने पर पहले खूब हंसते थे और फिर घर पहुंचकर मां की डांट खाते थे।

शाम को भीगे कपड़ों के साथ गरमा-गरम चाय और पकौड़ों की खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी।

आज वही रास्ते फिर सामने थे, लेकिन दोस्त अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में कहीं दूर निकल चुके हैं।

समय बदल गया…
लोग बदल गए…
लेकिन बारिश आज भी वैसी ही है।

खेतों में काम करते किसानों को देखकर सिर अपने आप झुक गया

गांव पहुंचा तो देखा कि खेतों में महिलाएं और पुरुष धान की रोपाई कर रहे थे।

बारिश लगातार हो रही थी, लेकिन किसी के चेहरे पर शिकायत नहीं थी।

उनके लिए यह पानी सिर्फ बारिश नहीं था।
यही उनकी उम्मीद थी।
यही आने वाले महीनों की रोटी थी।

मैं सोचने लगा…

हम शहर में थोड़ी-सी बारिश होते ही घर से निकलने में डरते हैं, लेकिन यही बारिश गांव के किसान के चेहरे पर मुस्कान बनकर उतरती है।

गांव बदल रहा है… लेकिन मिट्टी की खुशबू आज भी वही है

सच कहूं तो गांव भी पहले जैसा नहीं रहा।

अब कई घर पक्के हो गए हैं।
कई लोगों के हाथों में मोबाइल है।
बच्चे भी अब पहले की तरह पूरे दिन बारिश में नहीं खेलते।

फिर भी कुछ चीजें आज तक नहीं बदलीं।

बारिश के बाद खेतों से उठती मिट्टी की खुशबू…
बरामदे में बैठकर चाय पीते बुजुर्ग…
कच्चे रास्तों पर दौड़ते बच्चे…
और शाम होते ही घर लौटती गायें…

ये सब आज भी गांव को गांव बनाए हुए हैं।

शहर ने बहुत कुछ दिया… लेकिन गांव ने जीना सिखाया

भोपाल ने मुझे काम दिया।
पहचान दी।
सपने पूरे करने का मौका दिया।

लेकिन गांव ने मुझे जीवन जीना सिखाया।

यहीं मैंने पहली बार बारिश में भीगना सीखा।
यहीं पेड़ पर चढ़ना सीखा।
यहीं मिट्टी में खेलना सीखा।
यहीं बिना किसी स्वार्थ के रिश्ते बनाना सीखा।

शायद इसी वजह से इंसान चाहे दुनिया के किसी भी शहर में चला जाए, उसका दिल हमेशा अपने गांव का ही पता पूछता है।

अगर आपका भी कोई गांव है… तो एक बार जरूर जाइए

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर सोचते हैं कि समय नहीं है।

लेकिन सच तो यह है कि समय हमेशा निकल सकता है, बस मन होना चाहिए।

अगर आपके गांव में आज भी कोई पुराना घर है…
कोई पेड़ आपका इंतजार कर रहा है…
कोई खेत आपको पहचानता है…
या कोई बुजुर्ग हर बार पूछता है, “बेटा, इस बार कब आओगे?”

तो यकीन मानिए, वहां जरूर जाइए।

हो सकता है वहां जाकर आपको एहसास हो कि असली खुशी किसी मॉल, किसी महंगी कार या किसी बड़ी नौकरी में नहीं, बल्कि उस मिट्टी में छिपी है जहां आपने पहली बार चलना सीखा था।

निष्कर्ष: कुछ जगहें कभी पुरानी नहीं होतीं

भोपाल लौटते समय बस की खिड़की से मैं आखिरी बार अपने गांव को देख रहा था।

बारिश अब भी हो रही थी।

खेत पहले की तरह हरे थे।
हवा पहले की तरह ठंडी थी।
मिट्टी पहले की तरह महक रही थी।

तभी मन में एक बात आई—

शहर हमें सफल बना सकता है, लेकिन गांव हमें इंसान बनाए रखता है।

और शायद इसलिए…

जब भी सावन की पहली बारिश होती है, मेरा मन आज भी भोपाल की सड़कों से निकलकर सिरोंज के पास बसे अपने उस छोटे-से गांव की कच्ची पगडंडियों पर पहुंच जाता है, जहां हर बूंद में बचपन रहता है, हर हवा में अपनापन होता है और हर बारिश दिल को फिर से घर लौटा देती है।

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