सावन की बारिश के बाद जब सूखी धरती का रंग बदलने लगता है, खेतों की मेड़ पर नई घास उग आती है और आँगन में रखी तुलसी फिर से हरी दिखाई देने लगती है, तब प्रकृति मानो चुपचाप कहती है—जीवन समाप्त नहीं हुआ, वह केवल सही मौसम की प्रतीक्षा कर रहा था।
इसी बदलती ऋतु के बीच आती है हरियाली अमावस्या। इसे केवल पूजा-पाठ या एक पौधा लगाकर तस्वीर खिंचवाने का दिन मान लेना इसके अर्थ को बहुत छोटा कर देना होगा। यह पर्व हमें प्रकृति, अपने पूर्वजों और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी याद दिलाता है।
गाँवों में यह बात किसी किताब से नहीं सीखी जाती थी। घर की बुजुर्ग महिलाएं जानती थीं कि कौन-सा बीज किस मौसम में बोना है, तुलसी कब बदलनी है, नीम की पत्तियां किस काम आती हैं और पहली बारिश के बाद कौन-सा पौधा लगाया जाए तो वह जड़ पकड़ लेगा। उनके लिए प्रकृति की देखभाल कोई अलग अभियान नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी।
इसीलिए हरियाली अमावस्या भले ही केवल महिलाओं का त्योहार न हो, लेकिन इसके सांस्कृतिक और पर्यावरणीय स्वरूप में महिलाओं की भूमिका बहुत गहरी दिखाई देती है।
हरियाली अमावस्या 2026 कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण महीने के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हरियाली अमावस्या या श्रावणी अमावस्या कहा जाता है।
वर्ष 2026 में हरियाली अमावस्या 12 अगस्त, बुधवार को मनाई जा रही है।
नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार:
- अमावस्या तिथि प्रारंभ: 12 अगस्त 2026 को रात 1:52 बजे
- अमावस्या तिथि समाप्त: 12 अगस्त 2026 को रात 11:06 बजे
- उदया तिथि के अनुसार पूजा और धार्मिक कार्य: 12 अगस्त 2026
मुहूर्त और तिथि के समय में स्थान के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशेष पूजा या तर्पण के लिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग अथवा योग्य पुरोहित से समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।
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क्या हरियाली अमावस्या महिलाओं का त्योहार है?
इस प्रश्न का सीधा उत्तर है—हरियाली अमावस्या केवल महिलाओं का त्योहार नहीं है।
इस दिन स्त्री और पुरुष दोनों ही भगवान शिव-पार्वती की पूजा, पितरों का स्मरण, दान और पौधारोपण कर सकते हैं। अमावस्या तिथि होने के कारण परिवार के लोग अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
लेकिन कुछ क्षेत्रों की लोक-परंपराओं में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से दिखाई देती है। महिलाएं हरे वस्त्र और चूड़ियां पहनती हैं, सावन के गीत गाती हैं, पेड़ों पर झूले डालती हैं तथा मेले में भाग लेती हैं।
राजस्थान के उदयपुर में आयोजित हरियाली अमावस्या मेले की एक दिलचस्प परंपरा यह है कि मेले का एक दिन केवल महिलाओं के लिए रखा जाता है। पर्यटन मंत्रालय के उत्सव पोर्टल पर भी उदयपुर के इस पारंपरिक मेले में महिलाओं की विशिष्ट भागीदारी का उल्लेख मिलता है।
यहां हरियाली अमावस्या और हरियाली तीज के बीच अंतर समझना भी जरूरी है। हरियाली तीज मुख्यतः महिलाओं, वैवाहिक जीवन, श्रृंगार और शिव-पार्वती की उपासना से जुड़ा पर्व है। इसके विपरीत हरियाली अमावस्या का मूल संबंध प्रकृति, वर्षा ऋतु, पितृ-स्मरण, दान और पौधारोपण से है।
दोनों पर्व सावन और हरियाली से जुड़े होने के कारण अक्सर एक जैसे समझ लिए जाते हैं, जबकि इनकी तिथि और प्रमुख धार्मिक भाव अलग हैं।
किन क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है हरियाली अमावस्या?
हरियाली अमावस्या का सांस्कृतिक स्वरूप राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात और उत्तर भारत के कुछ अन्य हिस्सों में अधिक प्रमुखता से दिखाई देता है। राजस्थान के उदयपुर का हरियाली अमावस्या मेला विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
मध्य प्रदेश में भी सावन, शिव पूजा और पौधारोपण के साथ इस दिन को मनाने की परंपरा मिलती है। वर्ष 2026 में केंद्रीय कृषि मंत्रालय से जुड़ी पहल के अंतर्गत हरियाली अमावस्या के अवसर पर देशभर में 50 हजार से अधिक पौधे लगाने का अभियान भी घोषित किया गया।
बिहार में हरियाली अमावस्या उतने बड़े स्वतंत्र लोकपर्व के रूप में प्रसिद्ध नहीं है, जितने तीज, छठ, जितिया या वट सावित्री हैं। फिर भी श्रावण अमावस्या के रूप में स्नान, दान, पितृ-स्मरण और शिव पूजा की परंपराएं अनेक परिवारों में मिलती हैं।
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जीवन में प्रकृति के प्रति सम्मान किसी एक पर्व तक सीमित नहीं रहा। आँगन की तुलसी, बाड़ी की सब्जियां, खेत की मेड़, आम-नीम की छाया और गाँव का पोखर—ये सब जीवन और संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। इसलिए हरियाली अमावस्या के पर्यावरणीय संदेश को बिहार की माटी और ग्रामीण जीवन से आसानी से जोड़ा जा सकता है, भले ही वहां इसका मेला या उत्सव राजस्थान जैसा व्यापक न हो।
अमावस्या और हरियाली का साथ क्या कहता है?
सामान्यतः अमावस्या को अंधकार से जोड़कर देखा जाता है। उस रात आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता। लेकिन हरियाली अमावस्या एक अलग बात समझाती है—अंधकार के बीच भी नया जीवन जन्म ले सकता है।
धरती के भीतर पड़ा बीज बाहर से निष्क्रिय दिखाई देता है, लेकिन वर्षा का पानी मिलते ही उसमें अंकुर फूटने लगता है। ठीक इसी तरह मनुष्य के जीवन में भी कुछ समय ऐसे आते हैं जब बाहर से सब रुका हुआ लगता है। फिर कोई छोटी-सी आशा, सहयोग या सही अवसर जीवन को दोबारा हरा कर देता है।
इस दृष्टि से हरियाली अमावस्या केवल धार्मिक तिथि नहीं, पुनर्जीवन का प्रतीक भी है।
महिलाओं और प्रकृति का यह संबंध केवल पूजा तक सीमित नहीं
हमारे घरों में प्रकृति की पहली संरक्षक अक्सर महिलाएं ही रही हैं। दादी या मां रसोई से बचा पानी किसी पौधे में डाल देती थीं। गर्मी में छत पर पक्षियों के लिए पानी रखती थीं। बीज सुखाकर अगले मौसम के लिए बचाती थीं। घर छोटा हो तो भी तुलसी, मिर्च, धनिया या कोई फूल जरूर लगा लेती थीं।
इन छोटे कार्यों को कभी “पर्यावरण संरक्षण” जैसा बड़ा नाम नहीं दिया गया। फिर भी इनका असर वास्तविक था।
आज महिलाओं की भूमिका और व्यापक हो सकती है:
- घर में पानी की बर्बादी रोकना
- बच्चों को पेड़-पौधों की जिम्मेदारी देना
- रसोई के जैविक कचरे से खाद बनाना
- प्लास्टिक की पूजा सामग्री कम करना
- स्थानीय और कम पानी वाले पौधे चुनना
- मोहल्ले में लगाए गए पौधों की सामूहिक देखभाल करना
- छत या बालकनी में छोटा kitchen garden बनाना
- तालाब, कुएं और पोखर के आसपास कचरा न डालना
परिवार में भोजन, पानी और घरेलू खरीद से जुड़े अनेक निर्णय आज भी महिलाएं करती हैं। इसलिए उनके छोटे-छोटे फैसले पर्यावरण पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रकृति की देखभाल केवल महिलाओं की जिम्मेदारी है। घर के पुरुषों और बच्चों को भी इसमें बराबर भाग लेना चाहिए। पर्व तभी सार्थक होगा जब पूरी परिवार व्यवस्था जिम्मेदारी साझा करे।
एक पौधा लगाना आसान, उसे बचाना कठिन
हरियाली अमावस्या पर पौधा लगाने की तस्वीरें अक्सर सोशल मीडिया पर दिखाई देती हैं। तस्वीर में पौधा हरा होता है, आसपास लोग मुस्कुरा रहे होते हैं और हाथ में मिट्टी लगी होती है। लेकिन असली परीक्षा अगले दिन से शुरू होती है।
क्या उस पौधे को पानी मिलेगा?
क्या उसे जानवरों से बचाने की व्यवस्था होगी?
क्या कुछ महीने बाद कोई देखने जाएगा कि वह जीवित है या नहीं?
एक दिन में हजारों पौधे लगाए जा सकते हैं, लेकिन यदि उनकी देखभाल न हो तो यह संख्या केवल कागज पर रह जाती है।
हर परिवार इस दिन एक पौधा लगाए और उसके लिए एक व्यक्ति को जिम्मेदारी दे। बच्चे के नाम का पौधा लगाया जाए तो उसकी ऊंचाई और बढ़त का छोटा रिकॉर्ड भी बनाया जा सकता है। इससे बच्चे का प्रकृति से भावनात्मक संबंध बनता है।
यह एक दिन की पूजा से बढ़कर पूरे साल निभाया जाने वाला संकल्प होगा।
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कौन-सा पौधा लगाना बेहतर रहेगा?
पौधा केवल धार्मिक मान्यता या सोशल मीडिया पर उसकी सुंदरता देखकर न चुनें। अपने क्षेत्र की मिट्टी, उपलब्ध स्थान, पानी और जलवायु के अनुसार पौधा चुनना अधिक उपयोगी है।
पर्याप्त खुली जगह हो तो
नीम, जामुन, अर्जुन, आंवला या स्थानीय प्रजाति का कोई छायादार पेड़ लगाया जा सकता है। पीपल और बरगद बहुत बड़े वृक्ष बनते हैं, इसलिए इन्हें घर की दीवार, नाली या संकरी जगह के पास नहीं लगाना चाहिए।
छोटा आँगन या बालकनी हो तो
तुलसी, गुड़हल, चमेली, अपराजिता, कड़ी पत्ता, मिर्च, पुदीना या अन्य उपयुक्त पौधे लगाए जा सकते हैं।
खेत या गाँव की भूमि हो तो
स्थानीय कृषि अथवा वन विभाग की सलाह से क्षेत्रीय प्रजातियां चुनना बेहतर होगा। बाहरी सजावटी प्रजाति लगाने के बजाय ऐसा पेड़ चुनें जो स्थानीय पक्षियों, कीटों और मिट्टी के लिए उपयोगी हो।
“पुण्य” के नाम पर ऐसी जगह पौधा लगाना उचित नहीं जहां कुछ महीने बाद उसे काटना पड़े।
हरियाली अमावस्या 2026: परंपरा से पर्यावरण संरक्षण तक
हरियाली अमावस्या का संबंध केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं, बल्कि प्रकृति और हरियाली के प्रति हमारे जुड़ाव से भी रहा है। सावन के मौसम में आने वाली यह अमावस्या उस समय पड़ती है, जब बारिश के कारण धरती हरियाली से भरने लगती है और नए पौधों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। यही वजह है कि इस अवसर पर पौधरोपण का संदेश इसके मूल भाव से स्वाभाविक रूप से जुड़ जाता है।
12 अगस्त 2026 की हरियाली अमावस्या पर इसी भावना को एक बड़े वृक्षारोपण अभियान से जोड़ा गया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोगों से पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने की अपील की है। अभियान के तहत देशभर में 50 हजार से अधिक पौधे लगाने का संकल्प सामने आया है।
नई दिल्ली में तालकटोरा स्टेडियम के पास PBG ग्राउंड में भी वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है, जिसमें शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी प्रस्तावित है।
इस पहल का संदेश हरियाली अमावस्या की भावना को आज के संदर्भ में और व्यापक बनाता है—प्रकृति की पूजा केवल पेड़ को प्रणाम करने तक सीमित न रहे, बल्कि एक नया पौधा लगाकर उसे बड़ा करने की जिम्मेदारी भी उसका हिस्सा बने।
एक पौधा लगाएं, लेकिन जिम्मेदारी भी लें
अक्सर वृक्षारोपण के दौरान पौधे तो बड़ी संख्या में लगाए जाते हैं, लेकिन बाद में उनकी देखभाल नहीं हो पाती। इसलिए हरियाली अमावस्या पर यदि आप पौधा लगा रहे हैं, तो ऐसी जगह और ऐसा पौधा चुनें जिसकी नियमित देखभाल संभव हो। पानी देना, शुरुआती महीनों में उसकी सुरक्षा करना और समय-समय पर उसकी स्थिति देखना भी पौधरोपण जितना ही महत्वपूर्ण है।
महिलाओं के लिए हरियाली अमावस्या को अर्थपूर्ण बनाने के सात तरीके
1. घर की किसी बुजुर्ग महिला से पौधों का पारंपरिक ज्ञान पूछें
दादी या मां से पूछें कि पहले घर में कौन-कौन से पौधे लगाए जाते थे, बीज कैसे बचाए जाते थे और बारिश के पानी का उपयोग कैसे होता था। इस जानकारी को लिखकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।
2. पौधे की देखभाल का संकल्प लें
केवल पौधा लगाने के बजाय कम-से-कम एक वर्ष तक उसकी देखभाल करने का संकल्प लें।
3. बेटी के नाम एक पौधा लगाएं
बेटी, मां या परिवार की किसी महिला के नाम लगाया गया पौधा प्रकृति और स्त्री जीवन—दोनों के सम्मान का सुंदर प्रतीक बन सकता है।
4. पक्षियों के लिए पानी और दाना रखें
बारिश में भी पक्षियों को साफ पानी और सुरक्षित स्थान की जरूरत होती है। पात्र को नियमित रूप से साफ करना न भूलें।
5. प्लास्टिक-मुक्त पूजा करें
फूल, पत्ते और पूजा सामग्री प्लास्टिक की थैली में भरकर नदी या तालाब में न डालें। प्राकृतिक सामग्री को उचित तरीके से मिट्टी या compost में दिया जा सकता है।
6. बच्चों को भी साथ जोड़ें
बच्चों से मिट्टी भरवाएं, पौधे का नाम लिखवाएं और पानी देने की जिम्मेदारी सौंपें। उपदेश से ज्यादा उन्हें सहभागिता याद रहती है।
7. किसी कामकाजी महिला या जरूरतमंद परिवार की सहायता करें
दान केवल अनाज देने तक सीमित नहीं है। किसी महिला को पौधा, बीज, reusable sanitary products, कपड़े या उसकी वास्तविक जरूरत की वस्तु देना भी उपयोगी सहायता हो सकती है।
हरियाली अमावस्या की सरल पूजा-विधि
क्षेत्र और परिवार के अनुसार पूजा-पद्धति अलग हो सकती है। सामान्य रूप से इस दिन ये कार्य किए जाते हैं:
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- घर के पूजा-स्थान की सफाई करें।
- भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धापूर्वक पूजा करें।
- शिवलिंग पर स्वच्छ जल और बेलपत्र अर्पित किए जा सकते हैं।
- अपने पितरों और दिवंगत परिजनों का शांत मन से स्मरण करें।
- अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र या उपयोगी सामग्री दान करें।
- उपयुक्त स्थान पर पौधा लगाकर उसकी देखभाल का संकल्प लें।
- परिवार के साथ जल, पेड़ और मिट्टी को बचाने का कोई एक व्यावहारिक निर्णय लें।
यदि विधिवत तर्पण या श्राद्ध करना हो और उसकी प्रक्रिया का ज्ञान न हो, तो स्वयं अनुमान लगाने के बजाय परिवार की परंपरा अथवा योग्य पुरोहित का मार्गदर्शन लें।
पूजा में भय से अधिक श्रद्धा और दिखावे से अधिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
पितरों का स्मरण और पेड़ लगाना—दोनों कैसे जुड़े हैं?
अमावस्या पर पूर्वजों को स्मरण करने की परंपरा हमें बताती है कि हमारा जीवन केवल हमारा अपना नहीं है। हमें भाषा, संस्कार, भूमि, परिवार और अनेक सुविधाएं पिछली पीढ़ियों से मिली हैं।
पेड़ लगाना इसी भाव को आगे बढ़ाने जैसा है। जो व्यक्ति आज पेड़ लगाता है, जरूरी नहीं कि उसकी पूरी छाया स्वयं देख पाए। वह आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ छोड़कर जाता है।
इस प्रकार पितरों का स्मरण पीछे देखने की प्रक्रिया है और पौधारोपण आगे देखने की। हरियाली अमावस्या इन दोनों दिशाओं को एक ही दिन में जोड़ देती है।
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पूजा की थाली से बाहर भी होता है धर्म
यदि हम पेड़ की पूजा करें लेकिन रोज पानी व्यर्थ बहाएं, नदी में प्लास्टिक फेंकें या घर के सामने लगे पेड़ को केवल इसलिए कटवा दें कि उससे पत्तियां गिरती हैं, तो पूजा और व्यवहार के बीच दूरी रह जाती है।
प्रकृति के प्रति धर्म का वास्तविक रूप हमारे रोज के कामों में दिखाई देता है:
- नल खुला न छोड़ना
- भोजन बर्बाद न करना
- प्लास्टिक कम इस्तेमाल करना
- पूजा सामग्री जलाशय में न फेंकना
- पेड़ों पर कील और विज्ञापन न लगाना
- सार्वजनिक पौधों को भी अपना मानकर बचाना
- पशु-पक्षियों के लिए सुरक्षित स्थान छोड़ना
धर्म केवल यह नहीं कि हमने किस विधि से पूजा की; यह भी है कि पूजा के बाद हमारे व्यवहार में क्या बदला।
हरियाली अमावस्या पर लेने योग्य पांच छोटे संकल्प
- मैं कम-से-कम एक पौधे की पूरे वर्ष देखभाल करूंगी या करूंगा।
- घर में पानी की अनावश्यक बर्बादी रोकूंगा।
- पूजा सामग्री प्लास्टिक सहित नदी या तालाब में नहीं डालूंगा।
- बच्चों को प्रकृति से जुड़ा एक व्यावहारिक काम सिखाऊंगा।
- अपने पूर्वजों की स्मृति में कोई ऐसा कार्य करूंगा जिसका लाभ दूसरे लोगों या प्रकृति को मिले।
निष्कर्ष
हरियाली अमावस्या केवल हर रंग के कपड़े पहनने या पौधा लगाकर तस्वीर लेने का पर्व नहीं है। यह दिन पूछता है कि जिस धरती से हमें भोजन, जल, छाया और जीवन मिलता है, उसके लिए हमने क्या किया?
यह विशेष रूप से महिलाओं के लिए अपनी उस पारंपरिक भूमिका को नए अर्थ में देखने का अवसर है, जिसमें उन्होंने सदियों से घर, बीज, भोजन, पानी और आँगन की हरियाली को संभाला है। लेकिन यह जिम्मेदारी केवल महिलाओं पर छोड़ देना भी उचित नहीं। प्रकृति की देखभाल पूरे परिवार और समाज का साझा धर्म है।
सावन की भीगी माटी में लगाया गया छोटा-सा पौधा शायद आज बहुत साधारण दिखाई दे। वर्षों बाद वही किसी राहगीर को छाया देगा, किसी पक्षी का घर बनेगा और किसी अनजान बच्चे को फल देगा।
शायद यही हरियाली अमावस्या की सबसे सच्ची पूजा है—ऐसा काम करना जिसका फल केवल हमें नहीं, हमारे बाद आने वाले लोगों को भी मिले।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या हरियाली अमावस्या महिलाओं का व्रत है?
यह केवल महिलाओं का व्रत नहीं है। स्त्री और पुरुष दोनों पूजा, दान, पितृ-स्मरण और पौधारोपण कर सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में महिलाओं से जुड़े मेले, झूले, लोकगीत और श्रृंगार इसकी सांस्कृतिक विशेषता हैं।
हरियाली अमावस्या और हरियाली तीज एक ही हैं?
नहीं। हरियाली अमावस्या श्रावण मास की अमावस्या को आती है और प्रकृति, पितरों तथा पौधारोपण से जुड़ी है। हरियाली तीज शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है और महिलाओं तथा शिव-पार्वती पूजा से विशेष रूप से संबंधित है।
क्या हरियाली अमावस्या बिहार का प्रमुख त्योहार है?
बिहार में यह तीज, छठ या जितिया जैसा बड़ा स्वतंत्र लोकपर्व नहीं है। फिर भी कई परिवार श्रावणी अमावस्या के रूप में स्नान, दान, पितृ-स्मरण और शिव पूजा करते हैं। इसका अधिक प्रमुख सांस्कृतिक स्वरूप राजस्थान और मध्य प्रदेश सहित उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ क्षेत्रों में मिलता है।
क्या इस दिन पीपल का पौधा घर में लगा सकते हैं?
पीपल बहुत बड़ा वृक्ष बनता है। इसे घर की दीवार, नींव या संकरी जगह के पास लगाने से भविष्य में नुकसान हो सकता है। इसे पर्याप्त खुली और उपयुक्त जगह पर ही लगाएं।
क्या महिलाएं पितरों का स्मरण कर सकती हैं?
महिलाएं अपने पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण, प्रार्थना और दान कर सकती हैं। विधिवत तर्पण संबंधी परंपराएं परिवार और समुदाय के अनुसार अलग हो सकती हैं, इसलिए विशेष अनुष्ठान के लिए स्थानीय परंपरा का मार्गदर्शन लिया जा सकता है।
नोट: इस लेख में बताई गई पूजा और लोक-परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों एवं परिवारों में भिन्न हो सकती हैं। इन्हें धार्मिक मान्यता और सांस्कृतिक जानकारी के रूप में पढ़ें।

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