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तुलसीदास जयंती विशेष: ‘जाके प्रिय न राम बैदेही’—मीराबाई के एक सवाल का तुलसीदास ने दिया था यह सुंदर जवाब

तुलसीदास जयंती विशेष – जाके प्रिय न राम बैदेही पद और मीराबाई को तुलसीदास जी का भक्ति संदेश

गोस्वामी तुलसीदास को हम अक्सर रामचरितमानस और हनुमान चालीसा के रचयिता के रूप में याद करते हैं। लेकिन तुलसीदास को थोड़ा और करीब से पढ़ें तो उनकी रचनाओं में केवल भक्ति ही नहीं, जीवन के कठिन सवालों के जवाब भी मिलते हैं।

किसका साथ करना चाहिए, किससे दूरी बनानी चाहिए, रिश्तों और भक्ति के बीच टकराव हो जाए तो क्या करें और जीवन में सबसे ऊपर किसे रखें—तुलसीदास इन प्रश्नों पर भी बहुत सहज भाषा में अपनी बात कहते हैं।

तुलसीदास जयंती पर उनकी विनय-पत्रिका का एक ऐसा ही पद याद आता है—

“जाके प्रिय न राम-बैदेही…”

इस पद के साथ भक्त परंपरा में मीराबाई का एक बहुत सुंदर प्रसंग जुड़ा है। कहा जाता है कि जब परिवार के लोग मीराबाई की भक्ति में बाधा डालने लगे, तब उन्होंने तुलसीदास जी से पूछा था—ऐसी स्थिति में मैं क्या करूं?

तुलसीदास जी ने उत्तर में लंबा उपदेश नहीं दिया। उन्होंने एक पद के माध्यम से अपनी बात कह दी।


पहले संक्षेप में जानिए, कौन थे गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास मध्यकालीन भक्ति परंपरा के महान संत और रामभक्त कवि थे। उनका जीवन श्रीराम की भक्ति और रामकथा के प्रचार में बीता। परंपरागत जीवन-वृत्तांतों के अनुसार उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान चित्रकूट क्षेत्र के राजापुर में माना जाता है। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी बताया जाता है।

तुलसीदास का बचपन आसान नहीं रहा। उनसे जुड़ी परंपराओं में बताया जाता है कि बाल्यावस्था में उन्हें ‘रामबोला’ नाम मिला और गुरु नरहर्यानंद से राम-मंत्र की दीक्षा मिली। आगे चलकर उन्होंने वेद-वेदांग का अध्ययन किया।

तुलसीदास का विवाह रत्नावली से हुआ। उनके जीवन का एक प्रसिद्ध प्रसंग पत्नी रत्नावली से भी जुड़ा है। कहा जाता है कि तुलसीदास अपनी पत्नी से अत्यधिक आसक्त थे। एक बार रत्नावली ने उन्हें समझाया कि जितना प्रेम और लगाव वे उनके शरीर से रखते हैं, यदि उतना ही भगवान से हो जाए तो जीवन का कल्याण हो सकता है। यह बात तुलसीदास के हृदय में उतर गई और उनके जीवन की दिशा बदल गई।

इसके बाद उनका जीवन रामभक्ति में डूबता चला गया। उन्होंने जनभाषा में श्रीराम की कथा कही और रामचरितमानस जैसी अमर रचना दी। इसके अलावा विनय-पत्रिका, कवितावली, दोहावली सहित कई रचनाएँ उनके नाम से प्रसिद्ध हैं। उनकी भाषा की सबसे बड़ी खूबी यही रही कि गहरी आध्यात्मिक बात भी आम आदमी तक आसानी से पहुँच जाती है।

source: tulsidas-biography


जब मीराबाई के सामने खड़ी हुई एक कठिन परिस्थिति

मीराबाई की कृष्णभक्ति किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनका मन गिरधर गोपाल में ऐसा लगा कि सांसारिक प्रतिष्ठा और राजसी जीवन उनके लिए गौण हो गया।

लेकिन भक्त परंपरा में प्रसिद्ध कथा के अनुसार उनकी यही भक्ति परिवार के कुछ लोगों को स्वीकार नहीं थी। मीराबाई के भजन, साधु-संतों का संग और भगवान के प्रति उनका समर्पण परिवार में विरोध का कारण बनने लगा।

ऐसे समय में मीराबाई के सामने बड़ा सवाल था।

एक तरफ अपने लोग थे, परिवार था और सामाजिक मर्यादाएँ थीं। दूसरी तरफ वह भक्ति थी जिसे वे अपने जीवन से अलग नहीं कर सकती थीं।

कहा जाता है कि इसी दुविधा में उन्होंने तुलसीदास जी से मार्गदर्शन माँगा। भाव यही था—

“मेरे परिवारवाले भजन-मार्ग में बाधा पहुँचाते हैं, मुझे क्या करना चाहिए?”

उत्तर में तुलसीदास जी ने उन्हें यह पद भेजा—

‘जाके प्रिय न राम-बैदेही’

राग सोरठ

जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥

तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥

नाते नेह राम के मनियत, सुहृद सुसेब्य जहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं॥

तुलसी सो सब भाँति परम हित, पूज्य प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥

यह पद विनय-पत्रिका में मिलता है। मीराबाई को इसे उत्तर के रूप में भेजे जाने का प्रसंग भक्त परंपरा और तुलसीदास के जीवन-वृत्तांतों में प्रसिद्ध है।

जाके प्रिय न राम-बैदेही – brajrasik

‘जाके प्रिय न राम-बैदेही’ का क्या अर्थ है?

पहली ही पंक्ति बहुत सीधी और पहली नजर में कुछ कठोर भी लगती है—

“जाके प्रिय न राम-बैदेही,
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।”

सरल भाव यह है कि यदि कोई अत्यंत अपना और स्नेही व्यक्ति भी भगवान के प्रति हमारे प्रेम में लगातार बाधा बन रहा है, तो उसके ऐसे प्रभाव से बचना चाहिए।

यहां तुलसीदास केवल किसी व्यक्ति से नाराज होकर रिश्ता तोड़ देने की बात नहीं कर रहे। उनका विषय है—भगवत्प्रेम में बाधा।

यही बात समझाने के लिए वे अगली पंक्ति में कई उदाहरण देते हैं।

प्रह्लाद ने पिता की बात नहीं मानी, क्योंकि सवाल भगवान का था

“तज्यो पिता प्रहलाद…”

प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु स्वयं भगवान विष्णु से द्वेष रखते थे। उन्होंने अपने पुत्र को भी भगवान की भक्ति से रोकने की कोशिश की।

लेकिन प्रह्लाद ने पिता के दबाव में अपनी भक्ति नहीं छोड़ी।

यहां पिता से द्वेष नहीं था। चुनाव केवल इतना था कि पिता की वह बात मानी जाए जो भगवान से दूर करती है या भगवान का नाम पकड़े रखा जाए।

प्रह्लाद ने भगवान को चुना।

विभीषण के सामने अपना भाई रावण था

इसके बाद तुलसीदास कहते हैं—

“बिभीषन बंधु…”

विभीषण के सामने कोई पराया व्यक्ति नहीं, उनका अपना भाई रावण था।

लेकिन जब रावण अधर्म पर अड़ा रहा और श्रीराम के विरोध में खड़ा हुआ, तब विभीषण ने केवल भाई होने के कारण उसका साथ देना उचित नहीं समझा। उन्होंने रावण का पक्ष छोड़कर श्रीराम की शरण स्वीकार की।

यह उदाहरण बताता है कि हर परिस्थिति में अपने व्यक्ति का साथ देना ही प्रेम नहीं है। यदि अपना व्यक्ति गलत रास्ते पर है तो उसकी गलत बात में साथ न देना भी धर्म हो सकता है।

भरत ने माता कैकेयी की इच्छा स्वीकार नहीं की

तुलसीदास अगला उदाहरण भरत का देते हैं—

“भरत महतारी…”

कैकेयी भरत की माता थीं और उन्होंने जो कुछ किया, ऊपर से देखने पर वह भरत के हित के लिए ही था। उन्हें अयोध्या का राज्य मिल जाए, इसी इच्छा से उन्होंने राम के लिए वनवास माँगा।

लेकिन भरत ने ऐसा हित स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया जिसमें श्रीराम से अन्याय हो।

उन्होंने माता का त्याग द्वेष से नहीं किया, बल्कि उनकी अनुचित इच्छा को स्वीकार नहीं किया।

यह बहुत महीन अंतर है।

किसी से प्रेम करना और उसकी हर बात मान लेना एक ही बात नहीं है।

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राजा बलि और ब्रज की गोपियों का उदाहरण

तुलसीदास आगे कहते हैं—

“बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि…”

राजा बलि के सामने उनके गुरु शुक्राचार्य थे। दूसरी ओर भगवान वामन थे। जब भगवान को दिया हुआ वचन निभाने की बात आई तो बलि ने गुरु की रोक के बावजूद अपना समर्पण नहीं बदला।

इसी प्रकार ब्रज की गोपियों के लिए श्रीकृष्ण का प्रेम सामान्य सांसारिक आकर्षण नहीं, उनके जीवन का प्राण था। लोक-लाज और सांसारिक बंधन भी उनके उस प्रेम को रोक नहीं सके।

तुलसीदास इन सभी उदाहरणों को एक जगह रखकर मीराबाई की दुविधा का उत्तर देते दिखाई देते हैं—यदि भगवत्प्रेम सच्चा है तो उसे केवल इसलिए नहीं छोड़ देना चाहिए कि अपने लोग उसका विरोध कर रहे हैं।

‘अंजन कहा आँखि जेहि फूटै’—छोटी सी उपमा में बड़ी बात

इस पद की एक पंक्ति विशेष रूप से ध्यान खींचती है—

“अंजन कहा आँखि जेहि फूटै…”

अंजन यानी काजल।

काजल आंख के लिए लगाया जाता है। लेकिन यदि वही काजल आंख को नुकसान पहुँचाने लगे तो फिर उसका क्या उपयोग?

तुलसीदास इसी साधारण उदाहरण से रिश्तों की बहुत गहरी बात कह देते हैं।

परिवार, मित्र, गुरु और अपने लोग हमारे जीवन में सहारा बनने के लिए होते हैं। लेकिन यदि किसी का संग हमें उस मार्ग से ही दूर करने लगे जिसे हमने सत्य और भगवान का मार्ग माना है, तो केवल संबंध के नाम पर उसके हर प्रभाव को स्वीकार करना उचित नहीं।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि ऐसे व्यक्ति से घृणा की जाए। भक्त का रास्ता द्वेष का नहीं है। जरूरत हो तो व्यक्ति से नहीं, उसके गलत प्रभाव से दूरी बनाई जा सकती है।

इस पद का सबसे सुंदर संदेश अंतिम पंक्तियों में है

तुलसीदास अंत में बताते हैं कि आखिर हमारे लिए वास्तव में अपना कौन है—

“तुलसी सो सब भाँति परम हित, पूज्य प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥”

यानी जिसके संग और उपदेश से श्रीराम के चरणों में हमारा प्रेम बढ़े, वही वास्तव में हमारा परम हित करने वाला है। वही पूजनीय है और वही प्राणों से भी प्यारा है।

यहीं पूरा पद अपना अर्थ खोल देता है।

तुलसीदास यह नहीं पूछते कि कौन आपका रिश्तेदार है और कौन नहीं। उनकी कसौटी दूसरी है—

किसके संग से आपका मन भगवान की ओर जाता है?

जिसके पास बैठकर मन में भक्ति बढ़े, वह सत्संगी है। जो गलत रास्ते से बचाए, वह हितैषी है। जो स्वयं को बड़ा बनाने के बजाय भगवान से जोड़ दे, वह गुरु है। और जो हमारे भीतर भगवान के प्रति प्रेम बढ़ाए, तुलसी की दृष्टि में वह वास्तव में अपना है।

तुलसीदास केवल ‘राम’ नहीं, ‘राम-बैदेही’ कहते हैं

इस पद की पहली पंक्ति में एक बहुत सुंदर बात और है—

“जाके प्रिय न राम-बैदेही…”

यहां तुलसीदास केवल ‘राम’ नहीं कहते। वे राम-बैदेही कहते हैं—अर्थात श्रीराम के साथ माता जानकी।

उनकी भक्ति में श्रीसीताराम का स्वरूप दिखाई देता है। राम के साथ जानकी हैं तो उसमें मर्यादा के साथ करुणा, धर्म के साथ प्रेम और भगवान के साथ उनकी शक्ति भी जुड़ जाती है।

शायद इसीलिए तुलसी की वाणी में राम केवल अयोध्या के राजा बनकर नहीं आते, वे भक्त के अपने बनकर आते हैं।

क्या आज भी यह पद हमारे जीवन के लिए उपयोगी है?

बिल्कुल, लेकिन इसे समझदारी से पढ़ने की जरूरत है।

आज कोई व्यक्ति इस पद को पढ़कर यह निष्कर्ष निकाले कि जो हमारी धार्मिक मान्यता से सहमत नहीं है, उससे रिश्ता तोड़ देना चाहिए—तो यह इस पद का बहुत सतही अर्थ होगा।

तुलसीदास जिस स्थिति की चर्चा कर रहे हैं, वहां प्रश्न केवल मतभेद का नहीं बल्कि भक्ति के मार्ग में बाधा का है।

घर में दो लोगों की पूजा-पद्धति अलग हो सकती है। किसी की धार्मिक समझ अलग हो सकती है। इसके बावजूद प्रेम और सम्मान बना रह सकता है।

लेकिन कोई संबंध हमें लगातार हमारी आस्था, सदाचार या आध्यात्मिक मार्ग से हटाने लगे तो यह विचार करना जरूरी हो जाता है कि उसका हमारे जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ रहा है।

तुलसीदास हमें व्यक्ति से घृणा करना नहीं, अपनी आध्यात्मिक दिशा पहचानना सिखाते हैं।

तुलसीदास की सबसे बड़ी देन—भगवान को लोगों की भाषा में ले आए

तुलसीदास का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने महान ग्रंथ लिखे। उनकी बड़ी विशेषता यह भी थी कि उन्होंने कठिन आध्यात्मिक बातों को ऐसी भाषा में कहा जिसे सामान्य लोग भी समझ सकें।

रामचरितमानस में रामकथा घर-घर पहुँची, हनुमान चालीसा आज भी करोड़ों लोगों की दैनिक प्रार्थना का हिस्सा है और विनय-पत्रिका में भक्त का भगवान से सीधा संवाद दिखाई देता है।

तुलसी की रचनाओं में कहीं भक्त विनती करता है, कहीं अपनी कमजोरी स्वीकार करता है, कहीं भगवान को पुकारता है और कहीं जीवन के कठिन निर्णयों पर साफ बात करता है।

शायद इसी कारण सदियां गुजरने के बाद भी उनकी पंक्तियां पुरानी नहीं लगतीं।

तुलसीदास जयंती पर इस पद को क्यों याद करें?

तुलसीदास जयंती केवल उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाने या रामचरितमानस की चौपाइयां पढ़ने तक सीमित न रहे तो इसका अर्थ और बढ़ जाता है।

आज हम खुद से एक छोटा सा सवाल पूछ सकते हैं—

मेरे जीवन में किन लोगों के संग से मेरे भीतर अच्छाई बढ़ती है?

और दूसरा सवाल इससे भी महत्वपूर्ण है—

क्या मेरे संग से किसी दूसरे व्यक्ति के भीतर प्रेम, करुणा, भक्ति और अच्छाई बढ़ती है?

यदि उत्तर हां है तो शायद यही सत्संग की शुरुआत है।

मीराबाई के प्रश्न के उत्तर से जुड़ा तुलसीदास का यह पद आखिर में हमें रिश्ते तोड़ने की शिक्षा नहीं देता। वह इससे कहीं गहरी बात कहता है—रिश्ते निभाइए, प्रेम भी कीजिए, लेकिन अपने जीवन के परम लक्ष्य को मत भूलिए।

और तुलसीदास के लिए वह परम लक्ष्य था—श्रीसीताराम के चरणों में प्रेम।

इसीलिए उनकी अंतिम बात आज भी सीधे हृदय तक पहुँचती है—

“तुलसी सो सब भाँति परम हित, पूज्य प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥”

अर्थात जो हमारे हृदय में भगवान के चरणों का प्रेम बढ़ा दे, वास्तव में वही हमारा परम हितैषी है।

तुलसीदास जयंती पर गोस्वामी तुलसीदास को नमन।

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